जौर-ओ-बे-मेहरी-ए-इग़्माज़ पे क्या रोता है-कविता -फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

जौर-ओ-बे-मेहरी-ए-इग़्माज़ पे क्या रोता है-कविता -फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

जौर-ओ-बे-मेहरी-ए-इग़्माज़ पे क्या रोता है
मेहरबाँ भी कोई हो जाएगा जल्दी क्या है

ज़ुल्फ़-ए-शब-गूँ के सिवा नर्गिस-ए-जादू के सिवा
दिल को कुछ और बलाओं ने भी आ घेरा है

आ कि ग़ुर्बत-कदा-ए-दहर में जी बहलाएँ
ऐ दिल उस जल्वा-गह-ए-नाज़ में क्या रक्खा है

खो के इक शख्स को हम पूछते फिरते हैं यही
जिस की तक़दीर बिगड़ जाए वो करता क्या है

निगहे-शौक़ में और दिल में ठनी है कब से
आज तक हम न समझ पाए कि झगड़ा क्या है

इश्क़ से तौबा भी है हुस्न से शिकवे भी हज़ार
कहिए तो हज़रत-ए-दिल आप का मंशा क्या है

दिल तेरा, जान तेरी ,दर्द तेरा,ग़म तेरा
जो है ऐ दोस्त वो तेरा है,हमारा क्या है ?

दिल तिरा जान तिरी आह तिरी अश्क तिरे
जो है ऐ दोस्त वो तेरा है हमारा क्या है

हम जुदाई से भी कुछ काम तो ले ही लेंगे
बे-नियाज़ाना तअल्लुक़ ही छुटा अच्छा है

उन से बढ़-चढ़ के तो ऐ दोस्त हैं यादें इन की
नाज़-ओ-अंदाज़-ओ-अदा में तिरी रक्खा क्या है

ऐसी बातों से बदलती है कहीं फ़ितरत-ए-हुस्न
जान भी दे दे अगर कोई तो क्या होता है

यही गर आँख में रह जाए तो है चिंगारी
क़तरा-ए-अश्क जो बह जाए तो इक दरिया है

तुझ को हो जाएँगे शैतान के दर्शन वाइज़
डाल कर मुँह को गरेबाँ में कभी देखा है

न हो आँसू कोई हम दोनों तो बेहोश-से थे
चश्मे-पुरनम अभी तारा-सा कोई टूटा है

ज़ख़्म ही ज़ख़्म हूँ मैं सुब्ह की मानिंद ‘फ़िराक़’
रात भर हिज्र की लज़्ज़त से मज़ा लूटा है

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