जो बहुत तरसा-तरसा कर- चक्रांत शिला अज्ञेय- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय”-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

जो बहुत तरसा-तरसा कर- चक्रांत शिला अज्ञेय- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय”-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

जो बहुत तरसा-तरसा कर
मेघ से बरसा
हमें हरसाता हुआ,
-माटी में रीत गया ।

आह! जो हमें सरसाता है
वह छिपा हुआ पानी है हमारा
इस जानी-पहचानी
माटी के नीचे का ।
-रीतता नहीं
बीतता नहीं ।

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