जो बच रहा-कविताएँ -कुँवर नारायण-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kunwar Narayan

जो बच रहा-कविताएँ -कुँवर नारायण-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kunwar Narayan

पटना के निकट रेल-दुर्घटना में
मृतकों की सूची में देख कर अपना नाम
हरदयाल चौंक पड़े-“अरे,
मैं तो अभी जिन्दा हूँ!”
(फिर कौन था वह दूसरा, जो मारा गया?
क्या कोई और भी हो सकता है
मुझ जैसा ही?)

विस्फोट असफल रहा।
वे जिन्हें नहीं जीतना चाहिए था
हार गए अपने आप।

क़िले से उठता धुआँ

लगता है कोई भीषण दुर्व्यवस्था
हमारी रक्षा कर रही।

जो बच रहा उसने सोचा-
एक मौका है
अब लौटना चाहिए :
मनुष्य होने का पूरा तात्पर्य
संगठित हो सकता है
एक कूटुम्ब के आसपास :

निर्वाचित हो सकता है बहुमत से
पृथ्वी पर उसका प्रतिनिधित्व।

रसोई से उठता धुआँ
आश्चर्य, बिना सुरक्षा-बलों के भी
सुरक्षित थी गृहस्थी : पत्नी बेचारी
ईमानदारी की तरह खुश थी
नहीं-बराबर-जगह में भी :
साइकिल से स्कूल गया बच्चा
सकुशल लौट आया था
एक खुंख्वार ट्रेफ़िक के जबड़ों से बच कर…
पत्नी से बोले हरदयाल :

“शायद मैं स्वप्न देख रहा था।
सुनो, अब हमारी ख़ैर नहीं :
एक उत्तेजित भीड़ ने हमें
खुशी से गले मिलते देख लिया है,
हम चारों तरफ से घिर गए हैं,
कल ख़बर छपेगी कि हम
किसी मुठभेड़ में
या भेड़ियाधसान में मारे गए…।”

“नहीं, ऐसा नहीं होगा,” उसने सरलता से कहा,
“तुम डर गए हो :
वे हमारे पड़ोसी हैं।
उनकी आँखें हमारी ख़ुशी से नम हैं :
उन्हें अपने विश्वास का चेहरा दो-
वे भीड़ नहीं, हम हैं।”

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