जो तमाशा देखने, दुनिया में थे, आए हुए-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar

जो तमाशा देखने, दुनिया में थे, आए हुए-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar

जो तमाशा देखने, दुनिया में थे, आए हुए
कुछ न देखा, फिर चले, आख़िर वो पछताए हुए

फ़रशे-मख़मल पर भी मुशकिल से जिन्हें आता था ख़्वाब
ख़ाक पर सोते हैं अब वो, पांव फैलाए हुए

जो मुहय्या-ए-फ़ना-हसती में है मिसले-अहबाब
होते हैं अव्वल से ही पैदा वो कफ़नाए हुए

गुंचे कहते हैं कि होगा देखिए क्या अपना रंग
जब चमन में देखते हैं फूल कुमलाए हुए

ग़ाफ़िलो !इस अपनी हसती पर कि है नक्शे-ब-आब
मौज की मानिन्द क्यों फिरते हो बलखाए हुए

बे-कदम नक्शे-कदम पे बैठ सकता है कि हम
आप से बैठे नहीं, बैठे हैं बिठलाए हुए

ऐ ‘ज़फ़र’, बे-ऐबो-रहमत उसके क्योंकर बुझ सकें
नफ़से-सरकश के जो ये शोले हैं भड़काए हुए

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