जो औचक कहा गया-सागर-मुद्रा अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

जो औचक कहा गया-सागर-मुद्रा अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

मैं ने जो नहीं कहा
वह मेरा अपना रहा
रहस्य रहा:
अपनी इस निधि, अपने संयम पर
मैं ने बार-बार अभिमान किया।

पर आज हार की तीक्ष्ण धार
है साल रही: मेरा रहस्य
उतना ही रक्षित है
उतना-भर मेरा रहा
कि जितना किसी अरक्षित क्षण में
तुम ने मुझ से कहला लिया!

जो औचक कहा गया, वह बचा रहा,
जो जतन सँजोया, चला गया।

यह क्या मैं तुम से, या जीवन से
या अपने से छला गया?

नयी दिल्ली, 28 जून, 1968

Leave a Reply