जैसे सूआ उडत फिरत बन बन प्रति-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

जैसे सूआ उडत फिरत बन बन प्रति-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

जैसे सूआ उडत फिरत बन बन प्रति
जैसे ई बिरख बैठे तैसो फलु चाखयी ।
परबसि होइ जैसी जैसी ऐ संगति मिलै
सुनि उपदेस तैसी भाखा लै सभाखयी ।
तैसे चित चंचल चपल जल को सुभाउ
जैसे रंग संग मिलै तैसे रंग राखयी ।
अधम असाध जैसे बारुनी बिनास काल
साधसंग गंग मिलि सुजन भिलाखयी ॥१५५॥

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