जैसे पोसती सुनत कहत पोसत बुरो ।-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

जैसे पोसती सुनत कहत पोसत बुरो ।-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

जैसे पोसती सुनत कहत पोसत बुरो ।
तांके बसि भयो छाडयो चाहै पै न छूटयी ।
जैसे जूआ खेल बित हार बिलखै जुआरी ।
तऊ पर जुआरन की संगत न टूटयी ।
जैसे चोर चोरी जात ह्रिदै सहकत, पुन
तजत न चोरी जौ लौ सीस ही न फूटयी ।
तैसे सभ कहत सुनत माया दुखदाई
काहू पै न जीती परै माया जग लूटयी ॥५९१॥

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