जैसे निरमल दरपन मै न चित्र कछू-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

जैसे निरमल दरपन मै न चित्र कछू-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

जैसे निरमल दरपन मै न चित्र कछू
सकल चरित्र चित्र देखत दिखावयी ।
जैसे निरमल जल बरन अतीत रीत
सकल बरन मिलि बरन बनावयी ।
जैसे तउ बसुंधरा सुआद बासना रहत
अउखधी अनेक रस गंध उपजावयी ।
तैसे गुरदेव सेव अलख अभेव गति॥
जैसे जैसो भाउ तैसी कामना पुजावयी ॥३३०॥

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