जैसे तौ समुन्द बिखै बोहथै बहाय दीजै ।-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

जैसे तौ समुन्द बिखै बोहथै बहाय दीजै ।-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

जैसे तौ समुन्द बिखै बोहथै बहाय दीजै ।
कीजै न भरोसो जौ लौ पहुचै न पार कौ ।
जैसे तौ क्रिसान खेत हेतु करि जोतै बोवै ।
मानत कुसल आन पैठे ग्रेह द्वार कौ ।
जैसे पिर संगम कै होत गर हार नारि ।
करत है प्रीत पेखि सुत के लिलार कौ ।
तैसे उसतति निन्दा करीऐ न काहू केरी
जानीऐ धौ कैसो दिन आवै अंतकार कौ ॥५९५॥

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