जैसे चकयी मुदित पेखि प्रतिबिम्ब निसि-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

जैसे चकयी मुदित पेखि प्रतिबिम्ब निसि-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

जैसे चकयी मुदित पेखि प्रतिबिम्ब निसि
सिंघ प्रतिबिम्ब देखि कूप मै परत है ।
जैसे काच मन्दर मै मानस अनन्दमई
सांनपेखि आपा आपु भूजि कै मरत है ।
जैसे रविसुति जम रूप अउ धरमराय
धरम अधरम कै भाउ भै करत है ।
तैसे दुरमति गुरमति कै असाध साध
आपा आपु चीनत न चीनत चरत है ॥१६०॥

Leave a Reply