जैसे घरि लागै आगि जागि कूआ खोदीयो चाहै-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

जैसे घरि लागै आगि जागि कूआ खोदीयो चाहै-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

जैसे घरि लागै आगि जागि कूआ खोदीयो चाहै
कारज न सिधि होइ रोइ पछुताईऐ ।
जैसे तउ संग्राम समै सीख्यो चाहै बीर बिद्या
अनिथा उदम जैत पदवी न पाईऐ ।
जैसे निसि सोवत संघाती चलि जाति पाछे
भोर भए भार बाध चले कत जाईऐ ।
तैसे मायआ धंध अंध अविध बेहाय जाय
अंतकाल कैसे हरिनाम लिव लाईऐ ॥४९५॥

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