जैसे एक चीटी पाछै कोट चीटी चली जाति-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

जैसे एक चीटी पाछै कोट चीटी चली जाति-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

जैसे एक चीटी पाछै कोट चीटी चली जाति
इक टग पग डग मगि सावधान है ।
जैसे कूंज पाति भलीभांति सांति सहज मै
उडत आकासचारी आगै अगवान है ।
जैसे मृगमाल चाल चलत टलत नाह
जत्रतत्र अग्रभागी रमत तत ध्यान है ।
कीटी खग मृग सनमुख पाछै लागे जाह
प्रानी गुर पंथ छाड चलत अग्यान है ॥४१३॥

This Post Has 2 Comments

Leave a Reply