जीवन-नील कुसुम -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

जीवन-नील कुसुम -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

पत्थरों में भी कहीं कुछ सुगबुगी है ?
दूब यह चट्टान पर कैसे उगी है ?

ध्वंस पर जैसे मरण की दृष्टि है,
सृजन में त्यों ही लगी यह सृष्टि है ।

एक कण भी है सजल आशा जहाँ,
एक अंकुर सिर उठाता है वहाँ ।

मृत्यु का तन आग है, अंगार है;
जिन्दगी हरियालियों की धार है ।

क्षार में दो बूंद आँसू डाल कर,
और उसमें बीज कोई पाल कर,

चूम कर मृत को जिलाती जिन्दगी ।
फूल मरघट में खिलाती जिन्दगी ।

निर्झरी बन फूटती पाताल से,
कोंपलें बन नग्न, रूखी डाल से ।

खोज लेती है सुधा पाषाण में,
जिन्दगी रुकती नहीं चट्टान में ।

बाल भर अवकाश होना चाहिए,
कुछ खुला आकाश होना चाहिए,

बीज की फिर शक्ति रुकती है कहाँ ?
भाव की अभिव्यक्ति रुकती है कहाँ ?

(१९५४ ई०)

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