जीवन की कटुता को पल में हरने वाले राम।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

जीवन की कटुता को पल में हरने वाले राम।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

टूटा मन है हारा – हारा
भवसागर का नहीं किनारा,
जग की आँधी में बल इतना
जोर लगाऊँ अब मैं कितना?
अनजानी राहों में मंजिल धरने वाले राम
जीवन की कटुता को पल में हरने वाले राम।

जग वैरी सर कहाँ छुपाऊँ
स्नेह जगत् का कैसे पाऊँ?
शोणित की धारा दिख जाती
बूझ रही जीवन की बाती।
हारे हुए पथिक में फिर दम भरने वाले राम
जीवन की कटुता को पल में हरने वाले राम।

जीवन से वैराग्य नहीं दे
अश्क भरे वो भाग्य नहीं दे,
सुख-दुख में सम हमें बनाना
कृपा देव अपनी बरसाना।
अँधियारी रातों को जगमग करने वाले राम
जीवन की कटुता को पल में हरने वाले राम।

तन में दाता जान नहीं है
अज्ञानी हम, ज्ञान नहीं है,
मूढ़ मनुज हम, राही भटके
जीवन में झटके-ही-झटके।
पापी, दुष्ट, खलों से डटकर लड़ने वाले राम
जीवन की कटुता को पल में हरने वाले राम।

 

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