जि होंदै गुरू बहि टिकिआ-श्लोक -गुरू राम दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Ram Das Ji

जि होंदै गुरू बहि टिकिआ-श्लोक -गुरू राम दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Ram Das Ji

जि होंदै गुरू बहि टिकिआ तिसु जन की वडिआई वडी होई ॥
तिसु कउ जगतु निविआ सभु पैरी पइआ जसु वरतिआ लोई ॥
तिस कउ खंड ब्रहमंड नमसकारु करहि जिस कै मसतकि हथु धरिआ गुरि पूरै सो पूरा होई ॥
गुर की वडिआई नित चड़ै सवाई अपड़ि को न सकोई ॥
जनु नानकु हरि करतै आपि बहि टिकिआ आपे पैज रखै प्रभु सोई ॥3॥309॥

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