जिस डोर से खिंची चली तुम आती हो-आर्फ़ेउस- ऐसा कोई घर आपने देखा है अज्ञेय- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय”-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

जिस डोर से खिंची चली तुम आती हो-आर्फ़ेउस- ऐसा कोई घर आपने देखा है अज्ञेय- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय”-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

वह क्या मेरे संगीत की है
या तुम्हारे भीतर की
किसी न चुकने वाली गूँज की?
किसका गीत किसे बाँधे है
किसकी प्रतीति किसे खींचती है
जीवन देती है?
संगीत प्रकाश का एक घेरा
जो बाँधता है
जो मुक्त करता है-
एक अभिमन्त्रित परिमंडल!
क्या मैं उसे केवल आहूत कर सकता हूँ
उसमें प्रवेश नहीं कर सकता?
क्या तुम उसे केवल ढो सकती हो
उसके बाहर नहीं आ सकती?
बाहर! जहाँ फूल हैं। तितलियाँ हैं।
पीली। चमकीली।
डोलती हवाएँ हैं। नाचती प्रकाश-किरणें।
लहरें। स्मृति। मुक्तिप्रदा स्मृति।
और यह प्रभामंडल
जिसमें संगीत गूँजा है
और स्मृति केवल एक कारागार!
कौन तुम्हें खींच कर ला रहा है, प्रिया मेरी,
तुम्हारी स्मृति या मेरी विस्मृति-
कहाँ से उपजती है यह तड़पन
जो मेरा संगीत है?
मेरा संगीत?

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