जिसु अंदरि ताति पराई होवै-श्लोक -गुरू राम दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Ram Das Ji

जिसु अंदरि ताति पराई होवै-श्लोक -गुरू राम दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Ram Das Ji

जिसु अंदरि ताति पराई होवै तिस दा कदे न होवी भला ॥
ओस दै आखिऐ कोई न लगै नित ओजाड़ी पूकारे खला ॥
जिसु अंदरि चुगली चुगलो वजै कीता करतिआ ओस दा सभु गइआ ॥
नित चुगली करे अणहोदी पराई मुहु कढि न सकै ओस दा काला भइआ ॥
करम धरती सरीरु कलिजुग विचि जेहा को बीजे तेहा को खाए ॥
गला उपरि तपावसु न होई विसु खाधी ततकाल मरि जाए ॥
भाई वेखहु निआउ सचु करते का जेहा कोई करे तेहा कोई पाए ॥
जन नानक कउ सभ सोझी पाई हरि दर कीआ बाता आखि सुणाए ॥1॥308॥

Leave a Reply