जिससे कुछ चौंक पड़ें-कविता -फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

जिससे कुछ चौंक पड़ें-कविता -फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

जिससे कुछ चौंक पड़ें सोई हुई तकदीरें
आज होता है उन आँखों का इशारा भी कहाँ !

मैं ये कहता हूँ कि अफ़लाक से आगे हूँ बहुत
इश्क़ कहता है अभी दर्दे-दिल उठ्ठा भी कहाँ

राज़दाँ हाले-मोहब्बत का नहीं मैं, लेकिन
तुमने पूछा भी कहाँ,मैंने बताया भी कहाँ

तज़करा उस निगहे-नाज़ का दिल वालों में कहाँ
दोस्तों,छेड़ दिया तुमने ये किस्सा भी कहाँ

तेरा अंदाज़े-तगाफुल है खुला राज़,मगर
इश्क़ की आँखों से उठता है ये पर्दा भी कहाँ

ज़ब्त की ताब न थी फिरते ही वो आँख ‘फिराक़’
आज पैमाना-ए-दिल हाथ से छूटा भी कहाँ

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