जिसके चरण-चरण-(बुद्ध मुझे, अंधकार से निकालें)–अजय शोभने – हिन्दी कविता | (Ajay Shobhane) | Hindi Poem | Hindi Kavita,

जिसके चरण-चरण-(बुद्ध मुझे, अंधकार से निकालें)–अजय शोभने – हिन्दी कविता | (Ajay Shobhane) | Hindi Poem | Hindi Kavita,

जिसके चरण-चरण हों, करुणा से गर्वित,
मुझको बस ऐसा, सम्यक सम्बुद्ध चाहिए !

छला गया हूँ, अंधश्रद्धा-अंधविश्वासों से,
बस अब तो सत्य-मार्ग का ज्ञाता चाहिए !
शील, समाधी, प्रज्ञा, से भवन हो निर्मित,
मुझको अपना वो, स्वर्णिम तीर्थ चाहिए !

जिसके चरण-चरण हों, करुणा से गर्वित,
मुझको बस ऐसा, सम्यक सम्बुद्ध चाहिए !

भेद-भाव ने किया है कलुषित मेरे चित्त को,
समता स्थापित करने वाला, वो धम्म चाहिए !
अहिंसा सदाचरण विद्या हो आभूषण जिसके,
मुझको बस ऐसा अपना आराध्यदेव चाहिए !

जिसके चरण-चरण हों, करुणा से गर्वित,
मुझको बस ऐसा, सम्यक सम्बुद्ध चाहिए !

नहीं मिला कभी किसी को सुख शान्ति पथ,
अस्त्र-सस्त्र, धनुष-वाण और बम-बारूदों से !
फूल खिले हैं हरदम करुणा मैत्री भाईचारे से,
बैर अबैर से मिटा सके, ऐसा वो देव चाहिए !

जिसके चरण-चरण हों, करुणा से गर्वित,
मुझको बस ऐसा, सम्यक सम्बुद्ध चाहिए !

 

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