जिसके गालों में टिप्पे पड़ते हैं-कुछ और नज्में -गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar 

जिसके गालों में टिप्पे पड़ते हैं-कुछ और नज्में -गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar

ज़िक़्र उस परीवश का और फिर बयाँ अपना
बन गया रक़ीब आख़िर था जो राज़दाँ अपना
(ग़ालिब)

‘ज़िक़्र उस परीवश का-’
जिसके गालों में टिप्पे पड़ते हैं
जिसके दाँतों में बर्क़ रखी है
खिलखिलाकर वह जब भी हँसती है
नाक भी फड़फड़ाके हँसती है
उसके कानों में सुर्ख़ बेर लटकाकर
जो मयस्सर थी कायनात उसमें
और दो सय्यारे ढूँढ़े हैं

ज़िक़्र उस परीवश का
और फिर बयाँ अपना..
मेरे शेरों में झाँकते हैं लोग
चुप रहूँ मैं तो खाँसते हैं लोग

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