जिन्दगी-प्रहरी : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

जिन्दगी-प्रहरी : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

जिन्दगी मैं आज तुझपर हूँ फिदा
तू नहीं करना मुझे निज से जुदा।

बाग के हर पुष्प को दी तूने लाली
देख तुझको झूमती सुकुमार डाली।

देख अम्बर पर तुझे छाई घटा है
हर तरफ बिखरी हुई तेरी छटा है।

तू छिपी है प्रात की भी लालिमा में
चाँदनी में, याम की चिर कालिमा में।

बह रही अविरत नदी की धार में भी
सुमन के संग भ्रमर के इजहार में भी।

तू समन्दर की छिपी अगणित लहर में
मंजिलों में, है छिपी अवघट डगर में।

रंक से राजा सभी पीछे तुम्हारे
चल रही दुनिया सनम तेरे सहारे।

बैठ मेरे पास दो -पल प्यार कर लूँ
व्यग्र, आतुर आज अंगीकार कर लूँ।

अब न जाने दूँ , हमारे साथ ही चल
संगिनी मेरी अरी मुझको नहीं छल।

आज तुम स्वीकार कर या छोड़ दे
बंध चुकी जो गाँठ चाहे तोड़ दे।

तू नहीं है तो कहाँ औकात मेरी
दे कफन निकलेगी तब बारात मेरी।

जिन्दगी , तुझसे सजी सृष्टि सकल है
नभ, धरा , दिन-रात पर तेरा दखल है।

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