जिगर के पार गो तलवार निकले-ग़ज़लें-ख़याल लद्दाखी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Khayal Ladakhi

जिगर के पार गो तलवार निकले-ग़ज़लें-ख़याल लद्दाखी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Khayal Ladakhi

जिगर के पार गो तलवार निकले
सहन से होके जब दीवार निकले

हक़ीक़त है अयां लाशे पे मेरे
चलो ख़नजर बकफ़ कुछ यार निकले

मेरा दु:शमन भी है पत्थर मुझ ही सा
जो टकराए वह मुझ से नार निकले

वह घर से बे हिजाबाना चलें जब
क़यामत के अजब आसार निकले

ख़याल इक अनजुमन हैं आप ही में
ख़राबे से वो जब सरशार निकले

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