जाल समेटा -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 5

जाल समेटा -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 5

कामर

होगी जिसकी होगी
कामर
भीगी-भीगी,
भारी-भारी,
उसके तन से, मन से लिपटी ।

बली भुजाओं,
कसी मुट्ठियों,
लौह उँगलियों से
मैंने तो अपनी कसकर खूब निचोड़ी।

अब जिसका जी चाहे
उस पर बैठे, लेटे,
उसे समेटे,
देह लपेटे,
रक्खे, दे डाले या फेंके,
निर्ममता, निर्लिप्त भाव से
मैंने छोड़ी ।

बूढ़ा किसान

अब समाप्‍त हो चुका मेरा काम।
करना है बस आराम ही आराम।
अब न खुरपी, न हँसिया,
न पुरवट, न ल‍‍ढ़िया,
न रतरखाव, न हर, न हेंगा।

मेरी मिट्टी में जो कुछ निहित था,
उसे मैंने जोत-वो,
अश्रु स्‍वेद-रक्‍त से सींच निकाला,
काटा,
खलिहान का ख्‍लिहाल पाटा,
अब मौत क्‍या ले जाएगी मेरी मिट्टी से ठेंगा।

एक नया अनुभव

मैनें चिड़िया से कहा, मैं तुम पर एक
कविता लिखना चाहता हूँ।
चिड़िया नें मुझ से पूछा, ‘तुम्हारे शब्दों में
मेरे परों की रंगीनी है?’
मैंने कहा, ‘नहीं’।
‘तुम्हारे शब्दों में मेरे कंठ का संगीत है?’
‘नहीं।’
‘तुम्हारे शब्दों में मेरे डैने की उड़ान है?’
‘नहीं।’
‘जान है?’
‘नहीं।’
‘तब तुम मुझ पर कविता क्या लिखोगे?’
मैनें कहा, ‘पर तुमसे मुझे प्यार है’
चिड़िया बोली, ‘प्यार का शब्दों से क्या सरोकार है?’
एक अनुभव हुआ नया।
मैं मौन हो गया!

मौन और शब्द

एक दिन मैंने
मौन में शब्द को धँसाया था
और एक गहरी पीड़ा,
एक गहरे आनंद में,
सन्निपात-ग्रस्त सा,
विवश कुछ बोला था;
सुना, मेरा वह बोलना
दुनियाँ में काव्य कहलाया था।

आज शब्द में मौन को धँसाता हूँ,
अब न पीड़ा है न आनंद है
विस्मरण के सिन्धु में
डूबता सा जाता हूँ,
देखूँ,
तह तक
पहुँचने तक,
यदि पहुँचता भी हूँ,
क्या पाता हूँ।

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