जाल समेटा -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 1

जाल समेटा -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 1

रक्त की लिखत

क़लम के कारखाने हैं,
स्याही की फैक्टरियां हैं
(जैसे सोडावाटर की)
काग़ज़ के नगर हैं ।

और उनका उपयोग-दुरुपयोग
सिखाने के
स्कूल हैं,
कालेज हैं,
युनिवर्सिटियां हैं ।

और उनकी पैदावार के प्रचार के लिए
दुकानें हैं,
बाज़ार हैं,
इश्तहार हैं,
अख़बार हैं ।

और लोग हैं कि आँखें उठाकर उन्हें देखते भी नहीं,
उनके इतने अभ्यस्त हैं,
उनसे इतने परिचित हैं,
इतने बेज़ार हैं ।

पर अब भी एक दीवार हैं
जिस पर
अपने ख़ून में अपनी उँगली डबोकर
एक
सीधी
खड़ी
लकीर
खींच सकने वाले का
एक दुनिया को इंतज़ार है ।

 रक्षात्मक आक्रमण

जंगल के तो नियम
नहीं परिवर्तित होते-
जंगल चाहे देवदार का हो
कि सभ्यता का जंगल हो ।

‘जंगल में मंगल’
तो तुक की सिर्फ़ चुहल भर,
पर जंगल में
सदा रहा है,
सदा रहेगा,
ज़बरदस्त का ठेंगा सिर पर ।

और सभ्यता के जंगल में—
यह विकास की दिशा मान लें-
अन्तर करना मुश्किल होगा
पशु-नर बल में,
नर-पशु छल में ।
अर्द्ध रात्रि के
महामौन, महदांधकार में
एक माँद से
पंचानन चुपचाप निकलता,
मूक, दबे पाँवों से चलता-

गर्जन-तर्जन तो गंवार सिंहों की माषा-
और एक भोले-से मृग को देख उछलता
उसके ऊपर,
पटक उसे देता है भू पर,
औ’ उसके छटपटा रहे अंगों को पंजों दाब
कान में उसके कहता-
‘प्राण न लूंगा;
बस, लेटा रह भार ज़रा-सा मेरा सहता,
मैं तो तेरी रक्षा करने को आया हूं,
तुझे न मैं हथिया लेता तो
शायद बाहर आकर वह तुझको खा जाता
जो पड़ोस के झंखाड़ों से
ताक लगाए तुझपर रहता ।
धन्यवाद दे मुझको, मर्दे !’

नि:सहाय मृग प्रश्न करे क्या ?
क्या उत्तर दे ?
डरपाई-सी पौ फूटी है;
दृश्य देखकर
घबराए-से कौओं के दल
उचक फुनगियों पर,
औचक, भौचक उड़-उड़कर आसमान में
ज़ोर-ज़ोर से
मचा रहे हैं शोर-
‘ज़ोर!’ ‘ज़ोर!’ ‘ज़ोर!’-
बाक़ी सब चुप
क्योंकि सभी की
कहीं दबी है कोर ।

चेक आत्मदाही

अपने दुख, संकट, त्रास, प्यास, पीड़ा से
छुट्टी पाने को ?
या पीछा करते किसी भयानक सपने से ?-
संघर्ष नहीं कर सकता है वह, क्योंकि,
जगत से, जीवन से या अपने से?-
जी नहीं ।

अगर इतिहास
राष्ट्र को जकड़ इस तरह लेता है
उसके संघर्षण करने,
हिल-डुल सकने की भी शक्ति
व्यर्थ कर देता है-
छा जाता है अवसाद-अंधेरा
जन-जन के मन प्राणों पर-
म्रियमान जाति यदि नहीं—
एक सबका प्रतिनिधि बन उठे
स्वयं बनकर मशाल
विद्रोह और विश्वास, आग बाक़ी है,
बतला दे-
ऐसी मर्यादा है।

तू अपनी नियति निभाता है,
पालाच, तुझे मेरा प्रणाम,
मेरे स्वजनों, पुरखों,
मेरी बलिदानी परम्पराओं का;
तू आत्मघात कर
दलित राष्ट्र के,
दलित जाति के
नव जीवन का उपोद्घात कर जाता है ।

अग्निदेश

नहीं–
मैं यह आश्वासन नहीं दे सकूँगा
कि जब इस आग-अंगार
लपटों की ललकार,
उत्तप्त बयार,
क्षार-धूम्र की फूत्कार
को पार कर जाओगे
तो निर्मल, शीतल जल का सरोवर पाओगे,
जिसमें पैठ नहाओगे,
रोम-रोम जुड़ाओगे
अपनी प्यास बुझाओगे ।
नहीं–
इस आग-अंगार के पार भी
आग होगी, अंगार होंगे,
और उनके पार फिर आग-अंगार,
फिर आग-अंगार,
फिर और…
तो क्या छोर तक तपना-जलना ही होगा
नहीं-
इस आग से त्राण तब पाओगे
जब तुम स्वयं आग बन जाओगे !

रावण-कंस

रावण और कंस को
एक दूसरे को गाली देते,
एक दूसरे पर दाँत पीसते,
एक दूसरे के सामने खड़े होकर ताल ठोंकते
देखकर बहुत खुश न हो
कि अच्छा है साले आपस ही में कट मरेंगे।

मसीहाई का दावा नहीं करूँगा,
पर दुनिया को मैंने जैसे देखा-जाना है,
दुमुहीं, दुरुखी, दुरंगी,
उससे इतनी मसीहाई तो करना ही चाहूंगा
कि रावण और कंस
अगर आपस में लड़ मरेंगे
तो किसी दिन
राम और कृष्ण आपस में लड़ेंगे ।

नेतृत्व का संकट

अखिल भारतीय स्तर के अब
अमृतोद्भव उच्चै:श्रवा-सुरपति के वाहन-
स्वप्न हो गए-
धरती पर पग धरें
कि जैसे तपते आहन पर धरते हों,
जल पर ऐसे चलें
कि जैसे थल पर चलते-
वायु-वेग से टाप न डूबें-
और गगन में उड़ें
एक पर्वत-चोटी को छोड़
दूसरे पर्वत की चोटी पर जैसे
झंझा से प्रेरित बादल हों;
और नहीं चेतक भी,
जो हो रणोन्मत्त, उद्धत, उदग्र-चंचल अयाल-
उछलें
गयंद के मस्तक पर
टापों को धर दें;
और देश का दबा हुआ इतिहास
बाँस ऊपर उठ जाए;
लगा प्राण की बाज़ी नदी लांघें,
स्वामी की रक्षा में
बलि हो जाएँ ।
अब भारत के चक्करवाले रेस कोर्स में
खण्ड-खण्ड, उप खण्ड-खण्ड के
अपने-अपने मरियल घोड़े,
हड़ियल खच्चर,
अड़ियल टट्टू,
लद्धड़ गदहे,
जिनपर गांठे हुए सवारी हैं
अनाम, अनजाने जाकी,
जो जपने स्वामी जुआरियों की बाज़ी पर
सुटुक-सुटुक उनको दौड़ाते;
हार-जीत से उन्हें ग़रज़ क्या;
उनके वाहन अपना दाना-भूसा पाते,
वे अपनी तनख्वाहें पाते !

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