जाल समेटा -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 4

जाल समेटा -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 4

प्रेम की मंद मृत्यु

लेकिन वह धागा अब काल-जीर्ण,
शक्ति-क्षीण,
सड़ा-गला;
हिलो नहीं,
खिंचो नहीं,
तनो नहीं-,
यह शोख़ी यौवन ही झेल-खेल सकता था–
जहाँ और जैसी हो,
बुत-सी बन बैठी रहो,
समय सहो;
बंधन गिरेगा जब तिनका उठेगा नहीं
करने को प्रकट खेद ।

 लब्धि-उपलब्धि

उपलब्धि
कुछ करने को ही तो
मां-बाप-गुरूओं, बड़े-बूढ़ों ने सिखाया था;
और सिखाया था वही
जो उन्होंने संस्कारों से पाया था ।

उपलब्धि से क्या था उनका अर्थ-
विश्वविद्यालय की ऊँची उपाधि,
कार्यालय की ऊँची कुर्सी,
ऊँचा वेतन,
ऊँचे खानदान में ब्याह,
सन्तान,
ऊँचा मकान,
और चारों ओर सुख-सुविधा का सामान?
तब मेरे अन्दर से किसने किया था उनपर व्यंग्य-
हूँ-हैँ ये उपलब्धियां । उप-लब्धियां !
मेरे; लब्धियों के हैं अरमान,
उन्हीं के लिए होगा मेरा
अश्रु-स्वेद-रक्त प्रवहमान;
तुम्हारी परिभाषा की उपलब्धियां

स्वप्न और सीमाएँ

उठा लिया धन्वा एक
ढीली-सी तांत का;
कैसी थी विडम्बना !-
कर्म एक भाग्य-जना,
भाग्य एक कर्म-जना ।

दूर लक्ष्य,
उच्च लक्ष्य,
गगन लक्ष्य मुझको ललचाते रहे,
और मेरे वामन कर जोड़-जोड़
ढीली-सी डोरी पर ढीला शर
भूमि पर चुआते रहे,

स्वप्न रहा-
दण्ड-हस्त मुट्ठी में ग्रस्त चाप,
चुटकी में दबा हुआ वाण-मूल
अग्रशूल;
प्रत्यंचा खिंची हुई
कोण बनी हुई
कर्ण-स्पर्श प्राप्त
तदनुकल
सुता, कंसा, तना हुआ सब शरीर,
लक्ष्य साध मुक्त तीर,
मानों हो क्रुद्धमन महर्षि शाप !

कड़ुआ पाठ

एक दिन मैंने प्‍यार पाया, किया था,
और प्‍यार से घृणा तक
उसके हर पहू को एकांत में जिया था,
और बहुत कुछ किया था,
जो मुझसे भाग्‍यवान-उभागे करते हैं, भोगते हैं,
मगर छिपाते हैं;
मैंने छिपाए को शब्‍दों में खोला था,
लिखा था, गया था, सुनाया था,
कह दिया था,
गीत में, काव्‍य में,
क्‍यों कि सत्‍य कविता में ही बोला जा सकता है।

निचाट में अकेला खड़ा वह प्रसाद
एक रहस्‍य था, भेद-भरा, भुतहा;
बहुतों ने सुनी थी
रात-विरात, आधी रात
एक चीख, पुकार, प्‍यार का मनुहार,
मदमस्‍तों का तुमुल उन्‍माद, अट्टहास,
कभी एक तान, कभी सामूहिक गान,
दुखिया की आह, चोट खाए घायल की कराह,
फिर मौन (मौत भी सुना जा सकता)
पूछता-सा क्‍या? कब? कहाँ? कौन? कौ…न?…
मैं भी भूत हो जाऊँ, उसके पूर्व सोचा,
एक पारदर्शी द्वार है जो खोला जा सकता है।

भूतों का भोजन है भेद, रहस्‍य, अंधकार;
भूतों को असह्य उजियार,
पार देखती आँख,
पार से उठता सवाल।
भूतों की कचहरी भी होती है।
हो चुका है मुझसे अपराध,
भूतों का दल तन्‍नाया-भिन्‍नाया, मुझ पर टूट
माँग रहा है मुझसे
अपने होने का सबूत।
दरिया में डूबता सूरज,
झुरमुट में अटका चाँद,
बादल में झाँकते तारे,
हरसिंगार के झरते फूल,
दम घोंटती सी हवा,
विष घोलती-सी रात,
पाँवों से दबी दूब,
घर दर दीवार,
चली, छनी राह
पल, छिन, दिन, पाख, मास-
समय का सारा परिवार-
मूक!

मेरे श्‍ब्‍दों के सिवा कोई नहीं है मेरा गवाह।
मैंने महसूस कर ली है अपनी भूल,
सीख लिया है कड़ुआ पाठ,
पारदर्शी द्वार नहीं खोला जा सकता है।
सत्‍य कविता में ही बोला जा सकता है।

उन्होंने कहा था

नहीं धूप में मैंने बाल सफेद किए हैं-
बहुत ज़माना देखा है,
दुनिया देखी है,
सुख-दुख देखा, विजय-पराजय देखी,
अपने भी, औरों के जीवन में भी
आई-गई बहुत देखी है;
उदय पेम का
और नशा भी उसका
और खुमारी उसकी
औ’ उतार भी कई बार मैं देख चुका हूँ-
जो कहता हूँ अपने अनुभव से कहता हूँ;
शायद उसे कभी सच पाओ ।

वत्स, उमर ही यह ऐसी होती है जिसमें
लगती है हर गधी परी,
हर गधा शाह-नौशेरवान-
इंसान-कभी हैवान-कभी पाषाण-
देवता, और कभी भगवान
बराबर भी लगता है;
और प्रेम का मारा उनको
उसी तरह सम्बोधित कर
उनपर होता बलिहार
और पूजा उनकी करने लगता है ।

खुशक़िस्मत हैं
जो ऐसे भ्रम में अपने को
जीवन भर डाले रहते हैं
और देवता को भी अपने डाले रहते-
कमउम्री पर मौत बड़ी रहमत करती है;
किन्तु अभागे जो ज़्यादा दिन जीते
उनका नशा उतरता,
उनकी आँखों के ऊपर से पर्दा हटता
औ’ जीवन की कटु-कठोर सच्चाई उनके आगे आती ।
सत्य जान लेना छोटी उपलब्धि नहीं है;-
किसी मूल्य पर-
बदक़िस्मत को भी मुआविज़ा कुछ मिलता है ।

वहीँ तुम्हारी उम्र,
तुम्हारी आँखों में है वही नशा-सा,
वही ग़लतियां तुम करते,
आराध्य तुम्हारे हैं मुग़ालते में वैसे ही ।
मैं कहता हूँ, शायद इसे कभी सच पायो ।-
जियो उम्र भी मेरी लेकर,
मैं तो यही दुआ करता हूँ-
मोह-भंग करना ही तो है काम वक़्त का।

सच्चाई टूटती, मनुष्य उसे सह लेता;
सपने जब टूटते, टूट वह खुद जाता है-
गोकि टूटना सदा बुरा ही नहीं-
टूटने से भी कोई-कोई कुछ बन जाया करते।
टूटोगे तो, वत्स, बड़े दयनीय लगोगे-
पातक इससे बड़ा नहीं दुनिया के अन्दर ।-

‘लेकिन तुमसे
कहीं बड़ी दयनीय लगेगी परी,
प्रतिष्ठित हृदय-कुंज में,
जो धन-यश की लादी लादे
आज यहाँ कल वहाँ फिरेगी ।
पर सबसे दयनीय, वत्स, पाषाण लगेगा,
जो मन्दिर के एक उपेक्षित कोने में
लुढ़का-पुड़का रिरियाता होगा,
‘मैं ही हूँ भगवान, भक्तगण,
भोग लगायो मुझको,
मुझपर द्रव्य चढ़ाओ!’

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