जाम-बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh 

जाम-बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh

 

भालू के पेट में भालू के तलुवे
स्थिर है काल जो असीम।
लटकाये गला है जि़राफ़
उछल-उछल पड़ती ज़ेब्रा क्रासिंग

हंस वे कई हज़ार
चाहते झपटना पंख दूसरों के
बालक भिखारी भरी दोपहर
डुगडुगी बजाता और गाता हुआ गाना।

रह-रहकर हिलता है माथा
चाहे हो तरुण चाहे पुराना।
कण्डक्टर कहता पुकार कर
पीछे से आगे हो जाना।

 

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