जाने कब हो गया सबेरा-शंकर लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankar Lal Dwivedi 

जाने कब हो गया सबेरा-शंकर लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankar Lal Dwivedi

 

लाखों दीप जले रजनी भर,
मन पर छाया रहा अँधेरा।
जाने कब हो गया सबेरा।।

बैठा द्वार उलूक, नीम पर, काँप गईं अनमनी मुँडेरें।
बिछा गई पुरवा आँगन में, गुलमेंहदी और श्वेत कनेरें।।
एक साथ सुधियाँ, कुछ चिन्ता और कल्पना के घन छाए।
चमक-चमक वेदना-चंचला, मन का मृदु आकाश कँपाए।।
यों तो पहरेदार सजग थे, फिर भी लुटता रहा बसेरा।
जाने कब हो गया सबेरा।।

कुछ ऐसे कसमसा रही है-यह मेरी बीमार चेतना।
पाहन-तर की कुसुम किशोरी चाह रही हो किरण देखना।।
जब से इन मजबूर करों ने, ज़ंजीरों को किया समर्पण।
तब से मुखर नहीं हो पाया, यह धुँधला विवेक का दर्पण।।
किरणें पथ पर बिछीं समय से, पर मैं ही कुछ जगा अबेरा।
जाने कब हो गया सबेरा।।

अविरल अश्रुपात से निर्मल जल भी तो हिल-हिल जाता है।
परछाईं के साथ सोम भी लहरों में घुल-घुल जाता है।।
निर्विष व्यालों के जमघट-सा, कोलाहल आकुल भावों का।
लालचवश कर लिया स्वयं ही, असंतुलन जर्जर नावों का।।
पानी का क्या दोष, पी लिया मैंने ही जब बिना नितेरा।
जाने कब हो गया सवेरा।।

धागे सब के सब कच्चे हैं, चादर बुन भी लूँ तो क्या है?
होनी के हाथ में दुधारा, बहुत तेज़ है, बहुत नया है।।
मैं हूँ एक पराजित सैनिक, या कोई हत-पक्ष विहग हूँ।
सहगामी हो गए गगन-गत, दुर्विपाक्-वश पड़ा अलग हूँ।।
अविचल थकी उमर बैठी है, कागद रँगता रहा चितेरा।
जाने कब हो गया सवेरा।।

-9 जनवरी, 1965

 

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