जाग रही है माँ अभी-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

जाग रही है माँ अभी-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

सो गई है सारी धरा
रुक गए बहते दरिया
बात हो गई बेजवाब
दूर कहीं टिटहरी बोलती है
चुप गलियों में पसरी है
आदम पद्चाप
जाग रही है माँ अभी

चूल्हा-चौंका साज-संभाल के
दूध को जामण लगा
टोकरे नीचे रख आई है
कुत्ते-बिल्लियों का है डर
कहीं पी न जाएं वे
लालटेन की रौशनी में
किताब के पन्नों में
जाने क्या देखती है
शायद
बेटे की भाग्य रेखा
बेटी के अगले घर का नक्शा
मायके की सुख-शांति
ससुराल की खुशहाली के विस्तृत लेख

अनपढ़ होकर भी
कितना कुछ पढ़ती जाती है
चश्में में से
सारे संसार से रिश्ता जोड़ती
पेंसिल के निशानों को
ध्यान से बाँचती
पढ़े हुए को परखती-जाँचती
जाग रही है माँ अभी।

दादी बनकर भी जागती है अब भी
आकाश के तारे नहीं देखती
अक्षरों में
आँख के तारों के
सितारे पहचान रही है
माँ जाग रही है अभी।

जिन घरों की सो जाती माएँ
उन घरों को
जगाने वाला कोई नहीं होता
ईश्वर भी नहीं
माँ ईश्वर से बड़ा ईश्वर है
पृथ्वी सा बड़ा दिल
अंबर से बड़ी नजर
सागर से गहरी आस्था
हवाओं से तेज उड़ान
चंदन के बाग की
महकती बहार है

पिता तो राजा है
घर की
छोटी-मोटी जरूरतों से बेख़बर
खुद को हुक्मरां समझता है
वैसा ही लापरवाह
बच्चों के बस्ते से बेख़बर
शाहंशाह-ए-हिंद
देस-परदेस की चिंताओं में घुलता जाए
गोटियों से खेलता
उल्टी सीधी चालें चलता है तिकड़मबाज
इंसान को पहले आँकड़ो में बदलकर
शतरंज खेलता
दिन रात बिताता है

ये तो माँ ही है
जो धरती की तरह सबके
गुण-दोष ढाँपती
रोते को चुप करवाती
पलकों पर बिठाती
अपने मुँह से अपने लिए
कुछ नहीं माँगती
माँ जब तक जागती है
लालटेन भी नहीं बुझने देती
बेटी-बेटे और समस्त संसार के लिए
जाग रही है माँ अभी।

 

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