जाको धन, धरती हरी, ताहि न लीजै संग- (लोक-नीति)-कुण्डलियाँ -गिरिधर कविराय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Giridhar Kavirai

जाको धन, धरती हरी, ताहि न लीजै संग- (लोक-नीति)-कुण्डलियाँ -गिरिधर कविराय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Giridhar Kavirai

जाको धन, धरती हरी, ताहि न लीजै संग।
ओ संग राखै ही बनै, तो करि राखु अपंग ॥

तो करि राखु अपंग, भीलि परतीति न कीजै ।
सौ सौगन्दें खाय, चित्त में एक न दीजै ॥

कह गिरिधर कविराय, कबहुँ विश्वास न वाको ।
रिपु समान परिहरिय, हरी धन, धरती जाको ॥

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