ज़िंदगी फूस की झोंपड़ी है-ग़ज़लें व गीत-उदयभानु हंस -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Uday Bhanu Hans

ज़िंदगी फूस की झोंपड़ी है-ग़ज़लें व गीत-उदयभानु हंस -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Uday Bhanu Hans

ज़िंदगी फूस की झोंपड़ी है
रेत की नींव पर जो खड़ी है

पल दो पल है जगत का तमाशा
जैसे आकाश में फुलझ़ड़ी है

कोई तो राम आए कहीं से
बन के पत्थर अहल्या खड़ी है

सिर छुपाने का बस है ठिकाना
वो महल है कि या झोंपड़ी है

धूप निकलेगी सुख की सुनहरी
दुख का बादल घड़ी दो घड़ी है

यों छलकती है विधवा की आँखें
मानो सावन की कोई झ़ड़ी है

हाथ बेटी के हों कैसे पीले
झोंपड़ी तक तो गिरवी पड़ी है

जिसको कहती है ये दुनिया शादी
दर असल सोने की हथकड़ी है

देश की दुर्दशा कौन सोचे
आजकल सबको अपनी पड़ी है

मुँह से उनके है अमृत टपकता
किंतु विष से भरी खोपड़ी है

विश्व के ‘हंस’ कवियों से पूछो
दर्द की उम्र कितनी बड़ी है

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