ज़रा-सी देर में-किवाड़ _कविता संग्रह-कुमार अंबुज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kumar Ambuj

ज़रा-सी देर में-किवाड़ _कविता संग्रह-कुमार अंबुज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kumar Ambuj

 

ज़रा-सी देर में बड़ा हो गया मैं
और गाँव के सिवान से बाहर निकल आया
शहर की लड़की से प्यार किया
और ज़रा-सी देर में वह लड़की
लिपस्टिक की दुनिया में गायब हो गई
ज़रा-सी देर में मैं शराब पीने लगा
कॉलेज की आखिरी साल की परीक्षा से भाग आया
नौकरी खोजते हुए भूल गया मैं
गेहँ-चने के खेत
मेथी की भाजी और एक कोस दूर कुएँ का पानी

ज़रा-सी देर में नौकरी मिली
और आज तक नहीं छूटी

ज़रा-सी देर में नीम पर निंबौरी आ गई
और आँखों में पानी
पते पीले पड़ते हुए डाल छोड़ने लगे
छूट गई प्यार भरी जगह
और नई जगह का पानी सेहत के ख़िलाफ़ हो गया
ज़रा-सी देर में दोस्त बने
और कपड़ों से बारिश की गन्ध आने लगी

ख़त्म हो गई बैलों की जुगाली
ज़रा-सी देर में मैदान बनते हए ख़त्म हो गए
वृक्ष और पहाड़
खत्म हो गए चावल, गेहूँ और रसोईघर के चूहे
ज़रा-सी देर में हरित-क्रान्ति फैल गई
फैल गया हैज़ा
एक हवाई जहाज़ पक्षी की तरह गिर पड़ा
खिलौने की तरह लुढ़क गई रेलगाड़ी
ज़रा-सी ही देर में लड़की झूल गई पंखे पर
और टूट गए
मज़बूत दिखने वाले पिता के कन्धे

थके आदमी की गहरी नींद में
बस ज़रा-सी देर में चिड़िएँ बोलने लगीं
‘उठो, काम का वक्त हो गया!’

1988

 

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