ज़ख़्म को फूल तो सरसर को सबा कहते हैं-दर्द आशोब -अहमद फ़राज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ahmed Faraz,

ज़ख़्म को फूल तो सरसर को सबा कहते हैं-दर्द आशोब -अहमद फ़राज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ahmed Faraz,

ज़ख़्म को फूल तो सरसर को सबा कहते हैं
जाने क्या दौर है क्या लोग हैं क्या कहते हैं

क्या क़यामत है के जिन के लिये रुक रुक के चले
अब वही लोग हमें आबला-पा कहते हैं

कोई बतलाओ के इक उम्र का बिछड़ा महबूब
इत्तफ़ाक़न कहीं मिल जाये तो क्या कहते हैं

ये भी अन्दाज़-ए-सुख़न है के जफ़ा को तेरी
ग़म्ज़ा-ओ-अशवा-ओ-अन्दाज़-ओ-अदा कहते हैं

जब तलक दूर है तू तेरी परस्तिश कर लें
हम जिसे छू न सकें उस को ख़ुदा कहते हैं

क्या त’अज्जुब है के हम अहले-तमन्ना को “फ़राज़”
वो जो महरूम-ए-तमन्ना हैं बुरा कहते हैं

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