जहन्नुमी-लावा -जावेद अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Javed Akhtar 

जहन्नुमी-लावा -जावेद अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Javed Akhtar

मैं अक्सर सोचता हूँ
ज़ेहन की तारीक गलियों में
दहकता और पिघलता
धीरे धीरे आगे बढ़ता
ग़म का ये लावा
अगर चाहूँ
तो रुक सकता है
मेरे दिल की कच्ची खाल पर रक्खा ये अँगारा
अगर चाहूँ
तो बुझ सकता है
लेकिन
फिर ख़याल आता है
मेरे सारे रिश्तों में
पड़ी सारी दराड़ों से
गुज़र के आने वाली बर्फ़ से ठंडी हवा
और मेरी हर पहचान पर सर्दी का ये मौसम
कहीं ऐसा न हो
इस जिस्म को इस रूह को ही मुंजमिद कर दे

मैं अक्सर सोचता हूँ
ज़ेहन की तारीक गलियों में
दहकता और पिघलता
धीरे धीरे आगे बढ़ता
ग़म का ये लावा
अज़िय्यत है
मगर फिर भी ग़नीमत है
इसी से रूह में गर्मी
बदन में ये हरारत है
ये ग़म मेरी ज़रूरत है
मैं अपने ग़म से ज़िंदा हूँ

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