जब लगें ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाए-ग़ज़लें(तन्हा सफ़र की रात)-जाँ निसार अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaan Nisar Akhtar

जब लगें ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाए-ग़ज़लें(तन्हा सफ़र की रात)-जाँ निसार अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaan Nisar Akhtar

जब लगें ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाए
है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए

दिल का वो हाल हुआ है ग़म-ए-दौराँ के तले
जैसे इक लाश चटानों में दबा दी जाए

इन्हीं गुल-रंग दरीचों से सहर झाँकेगी
क्यूँ न खिलते हुए ज़ख़्मों को दुआ दी जाए

कम नहीं नश्शे में जाड़े की गुलाबी रातें
और अगर तेरी जवानी भी मिला दी जाए

हम से पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या
चंद लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए

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