जन्म-महल-सरवरिन्दर गोयल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sarvarinder Goyal 

जन्म-महल-सरवरिन्दर गोयल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sarvarinder Goyal

 

मोहे अगर कोई आके पूछत, हैं राम कहाँ वसियन ,
कहाँ प्रभु को जनम हुआ, कहाँ रास रसाये रसियन,
मोरे राम वस्त हैं कुटियन में, या वस्त तोहरे मन!—-

न नगर न महल है भावत, मन -भावत है वण ,
न वहां कोई चोर चाकरी, न चुगली न हरण !
मोरे राम वस्त हैं कुटियन में, या वस्त तोहरे मन —-

वहां समय चले दिन रात से, न पहर चले न क्षण ,
भांत भांत के फूल खिलत, जी देखत हो प्रसन!
मोरे राम वस्त हैं कुटियन में, या वस्त तोहरे मन —-

न वहां कोई वणज व्पारी, न दौलत न धन,
न लगे कोई रोग बीमारी, न मन को भटकन!
मोरे राम वस्त हैं कुटियन में, या वस्त तोहरे मन —-

न वहां कोई बिस्तर- वस्त्र, न मुकट-भूषण ,
न वहां कोई आर -सिंगार, न इत्र भीतर दूषण !
मोरे राम वस्त हैं कुटियन में, या वस्त तोहरे मन —-

न वहां कोई शाशक है, न कूटनीति शासन,
न बनाये कोई मंदिर मोरा, न उगले विषयत भाषण !
मोरे राम वस्त हैं कुटियन में, या वस्त तोहरे मन —-

न कोई किसी को पूजत है, न करे दान – कृपण ,
प्रभु-प्रभु ही प्रभु है, बिन मांगे हो दर्शन !
मोरे राम वस्त हैं कुटियन में, या वस्त तोहरे मन —-

न वहां कोई भवन उसारे, न भूमि पूजन ,
राम जने इस माटी से, मोरे राम वसे कण कण,
ईंट-पत्थर का मंदिर नाही, मोरा मंदिर मन !!
मोरे राम वस्त हैं कुटियन में, या वस्त तोहरे मन —-

 

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