जननी सुतह बिखु देत हेतु कउन राखै-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

जननी सुतह बिखु देत हेतु कउन राखै-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

जननी सुतह बिखु देत हेतु कउन राखै
घरु मुसै पाहरूआ कहो कैसे राखीऐ ।
करिया जउ बोरै नाव कहो कैसे पावै पारु
अगूआ ऊबाट पारै कापै दीनु भाखीऐ ।
खैते जउ खाय बारि कउन धाय राखनहारु
चक्रवै करै अन्याउ पूछै कउनु साखीऐ ।
रोगीऐ जउ बैदु मारै मित्र जउ कमावै द्रोहु
गुर न मुकतु का पै अभलाखीऐ ॥२२१॥

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