जनता-जलते हुए वन का वसन्त-खण्ड दो-दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar 

जनता-जलते हुए वन का वसन्त-खण्ड दो-दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

जब कुछ भी
अतुल अंधकार के सिवा बचता नहीं
तब लोगों को
बाँसों की तरह इस्तेमाल किया जाता है हहराते सागर
में गहराई नापने के लिए ।

एक-दो-तीन
और सब-
यानी सभी बाँस
छोटे पड़ जाते हैं,
छोड़ दिए जाते हैं सागर में ।
यानी
फिर और नए बाँसों की आवश्यकता होती है हहराते
सागर में गहराई नापने के लिए ।

यह एक अखंड क्रम है…
और उनके अजीब विश्वास हैं
उनके हाथों में बहुत सारे बाँस हैं
बाँसों पर बाँस
हहराते सागर की गहराई नापने के लिए ।

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