जनता और जवाहर-धूप और धुआँ -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar 

जनता और जवाहर-धूप और धुआँ -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

फीकी उसांस फूलों की है,
मद्धिम है जोति सितारों की;
कूछ बुझी-बुझी-सी लगती है
झंकार हृदय के तारों की ।

चाहे जितना भी चांद चढ़े,
सागर न किन्तु, लहराता है;
कुछ हुआ हिमालय को, गरदन
ऊपर को नहीं उठाता है ।

अरमानों में रौशनी नहीं,
इच्छा में जीवन का न रंग,
पांखों में पत्थर बाँध कहीं
सूने में जा सोई उमंग ।

गम की चट्टानों के नीचे
जिन्दगी पड़ी सोई-सी है,
निर्वापित दीप हुआ जब से,
जनता खोई-खोई-सी है ।

झालरें ख्वाब के परदों की,
झांकी रंगीन घटाओं की,
दिखलाते हैं ये तसवीरें,
किसको आसन्न छटाओं की ?

तम के सिर पर आलोक बांध
डूबा जो नरता का दिनेश,
उस महासूर्य की याद लिये
बेहोशी में हैं पड़ा देश ।

औरों की आँखें सूख गईं,
हैं सजल दीनता के लोचन,
औरों के नेता गये, मगर,
जनता का उज़ड़ गया जीवन ।

चुभती है पल-पल, घड़ी-घड़ी
अन्तर में गाँस कसाले की,
भूलती याद ही नहीं कभी
छाती छिदवानेवाले की ।

आँखें वे मलिन गुफाओं में
शीतल प्रकाश भरनेवाली,
मुस्कानें वे पीयूषमयी,
उम्मीद हरी करनेवाली ।

सबके पापों का बोझ उठाये
फिरना जान अकेली पर,
बापू का वह घूमना प्राण
को निर्भय लिये हथेली पर ।

अभिशप्त देश के हाथों से
विष-कलश खुशी से ले जाना,
फिर उसी अभागे की खातिर
अनमोल जिन्दगी दे देना ।

इन अमिट झांकियों से लिपटा
अन्तर स्वदेश का सोता है,
है किसे फिक्र आवाज सुने ?
समझे कि कहाँ क्या होता हैं ?

इस घमासान अँधियाले में
आशा का दीपक एक शेष,
जनता के ज्योतिर्नयन ! तुम्हें
ही देख-देख जी रहा देश ।

जो मिली विरासत तुम्हें,
आँख उसकी आंसू से गीली है,
आशाओं में आलोक नहीं,
इच्छाएँ नहीं रंगीली हैं ।

इस महासिन्धु के प्राणों में
आलोड़न फिर भरना होगा,
जनतन्त्र बसाने के पहले
जन को जाग्रत करना होगा ।

सपनों की दुनिया डोल रही,
निष्ठा के पग थर्राते हैं,
तप से प्रदीप्त आदर्शों पर
बादल-से छाये जाते हैं ।

इस गहन तमिस्रा को बेधो,
शायक नवीन संधान करो,
ऊँघती हुई सुषमायों का
किरणों पर चढ़ आह्वान करो ।

जनता विषण्ण, जनता उदास,
जनता अधीर अकुलाती है,
निरुपाय तुम्हारी जय पुकार
वह अपना हृदय जुड़ाती है ।

तम-गहन उदासी के भीतर
आशा का यह उच्चार सुनो,
इस महाघोर अंधियाले में
अपनी यह जय-जयकार सुनो ।

भीतर आवेगों की आंधी
ज्यों-ज्यों हो विवश मचलती है,
त्यों-त्यों अधीर जन-कंठों से
आकुल जयकार निकलती है ।

हैं पूछ रहे जय के निनाद,
कब तक यह रात खतम होगी ?
सूखेंगे भीगे नयन और
वेदना देश की कम होगी ।

जो स्वर्ग हवा में हिलता है,
मिट्टी पर वह कब आयेगा ?
काले बादल हैं जहाँ, वहाँ
कब इन्द्रधनुष लहरायेगा ?

झूलता तुम्हारी आँखों में
जो स्वर्ग, हमारी आशा है,
तुम पाल रहे हो जिसे, वही
भारत भर की अभिलाषा है ।

आंसू के दानों में झरते,
वे मोती निर्धनता के हैं,
लिखते हो जो कूछ, वही लेख
सौभाग्य दीन जनता के हैं ।

सब देख रहे हैं राह, सुधा
कब धार बाँधकर छूटेगी,
नरवीर ! तुम्हारी मुट्ठी से
किस रोज रौशनी फूटेगी ?

है खड़ा तुम्हारा देश, जहां भी
चाहो, वहीं इशारों पर !
जनता के ज्योतिर्नयन ! बढ़ाओ
कदम चांद पर, तारों पर ।

है कौन जहर का वह प्रवाह
जो-तुम चाहो औ’ रुके नहीं
है कौन दर्पशाली ऐसा
तुम हुक्म करो, वह झुके नहीं ?

न्योछावर इच्छाएँ, उमंग,
आशा, अरमान जवाहर पर,
सौ-सौ जानों से कोटि-कोटि
जन हैं कुरबान जवाहर पर ।

नाजाँ है हिंदुस्तान,
एशिया को अभिमान जवाहर पर,
करुणा की छाया किये रहें
पल-पल भगवान जवाहर पर ।
(1949)

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