जग ने प्यार नहीं पहचाना-नदी किनारे-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

जग ने प्यार नहीं पहचाना-नदी किनारे-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

जग ने प्यार नहीं पहचाना !

मेरे अलि-मन को कलियों का परिमल करता पान देखकर,
जग ने अगणित जाल बिछाये उस पर निर्ममता से जी भर,
पर जर्जर तन पर काँटों का कटु संसार नहीं पहचाना!
जग ने प्यार नहीं पहचाना!

मधु की मादकता में निहित कवि का मादक गायन सुनकर,
चीख उठा जग शत-मुख से वासना विनिर्मित है इसका स्वर,
पर उसके मन में होता चिर हाहाकार नहीं पहचाना!
जग ने प्यार नहीं पहचाना!

माणिक-मुक्ताओं से सज्जित कर में मधु की प्याली लखकर,
जग बोला इसने पाली है अमर-वारुणी मधुमय सुखकर,
पर उसके तल में लहराता विष का ज्वार नहीं पहचाना।
जग ने प्यार नहीं पहचाना!

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