जउ लउ अनरस बस तउ लउ नही प्रेम रसु-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

जउ लउ अनरस बस तउ लउ नही प्रेम रसु-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

जउ लउ अनरस बस तउ लउ नही प्रेम रसु
जउ लउ अनरस आपा आपु नही देखीऐ ।
जउ लउ आन ग्यान तउ लउ नही अध्यातम ग्यान
जउ लउ नाद बाद न अनाहद बिसेखीऐ ।
जउ लउ अहम्बुधि सुधि होइ न अंतरि गति
जउ लउ न लखावै तउ लउ अलख न लेखीऐ ।
सतिरूप सतिनाम सतिगुर ग्यान ध्यान
एक ही अनेकमेक एक एक भेखीऐ ॥१२॥

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