छल का नाम गन्ध भी कहाँ-मैं मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun 

छल का नाम गन्ध भी कहाँ-मैं मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun

प्रीति स्निग्ध, बुद्धिदीप्त, दो आँखें यहाँ
यहाँ किसी छल का नाम गन्ध भी कहाँ
सुठाम सुविस्तृत सुभाल पर सिन्दूरी गोलक
नासिकाग्र पर दुलित कलित लघु कंचन लोलक
ध्यान आते ही घूमन्तर माथे की व्यथा
खिल उठती है अन्तर तल में रूपकथा

कहाँ रही अब तक तुम मेरी तिलोत्तमे
भुला कहाँ पाया कभी, तुमको सुमध्यमे
प्रीति स्निग्ध, बुद्धिदीप्त दो आँखें यहाँ
यहाँ किसी छल का नाम गन्ध भी कहाँ

Leave a Reply