छबील, नदी के तल में (कआरे दरिया सलसबील)- कविता -अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

छबील, नदी के तल में (कआरे दरिया सलसबील)- कविता -अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

 

असली छबील नदी के तल में होती है
ऊपर की तह पर तो होती आग बसी
-ग़ालिब

तेरी ज्वाला भड़कती रहे, बढ़ती रहे प्यास
है साँस तेरी गुलाब आँखें तेरी मदिरा मदिरा

याद तुम्हें है, उस पठार पर मैंने
क़िस्मत में थी जो कितनी रेत खँगाली उँगलियों से
मेरी बेकल नज़रों ने तुमको काला संदेश सुनाया था
बहुत अविश्वासी है देखो यह अनादि सागर

अनजाने में ऐसे ही छल गया मुझे भी
खेल खेल में मुझे अंधे तूफ़ान ने घेरा
कहाँ जानता था मैं बुलबुल ही हुदहुद बन
मेरे सीने को ऐसे कुरेद डालेगी !
संतुष्ट हिरण था एक सघन जंगल में
खुली धूप में फूदका करता,
और खेलता छायाओं से
उसको अपनी नज़र छल गई
जब सोते के पानी ने उससे पूछा
तू कौन, देखता क्या हैरान नज़रों से ?

मन था जिज्ञासु, सवालों की बरछियाँ चुभोता
किसके न्यौते पर यह वसंत वल्लरी आई ?
क्या लगती चाँदनी सूर्य की ?
भुक्खड़ कीड़े को किसने दे दिया गुलाबी कोटर ?
कहाँ सिकंदर चला गया, कब्र के अंदर ?

फुफकार रहा सागर, उस पर नाव एक निर्बध चले
अनजाने माँझी की सोच बहुत है धुंध से भरी
जो भी लहर उठे, काटने को दौड़े
उभरा जो बुलबुला, उभरते ही फूटा

चंचल शिशु का मिट्टी का था एक खिलौना टूट गया
दरवाज़े दीवारें उस पर विहँस पड़ीं
फाँसी उसकी गर्दन में लगी, आँखें उसकी फूट आई
न ही उसे माँ मिली न उसने बापू को ही देखा

यहाँ निराशा छाई, ठंडक, वीरानी ने घेरा है
कोई अज़ान देने वाला बांगी भी नहीं कि
रात को रोशन करता
नहीं देवता कोई देवालय को बसाए
मन में आशीर्वाद नहीं आँखों में कोई प्रत्याशा

हिरण जंगली है पठार पर जाने किसे तलाश रहा
न ही धूप में गर्मी है, ठंड़क छाया में नहीं रही
नहीं खिला घास का ही तिनका
काँटा भी कहीं नहीं फूटा
लटकी हुई धूल है प्यासी चारों ओर

ऐसे ही धूसर में तूने एक बार फिर जन्म लिया
तेरा मन था मेरी ओर खुला-सा, मैंने पहचाना
तूने जो ज्यों, वही सेब शाखा से तोड़ा
वहीं खु़दाई ज्यों हो मैंने तुम पर वारी
यह तूफ़ान नहीं ‘नूह’ के तूफ़ां सा था
जिसे पार करने को देते पैसा पैसा
हमें पार करना था बस ‘सिरात’ का पुल, अलग अकेले
उस पर तुझको नहीं रार थी कोई
मुझको भी थी नहीं शिकायत

अरे आज हम खेल खेल में कहाँ आ गए
मेरे दिल में जनम रहा है आज वासंती कलरव
वह बाग़ सलामत रहे
बेदाग़ फ़रिश्तों को
मेरे लिए बना रहे वह अंगराग
सेबों के रंग का तुम पर

अब कुछ बाधा नहीं, उठाओ नज़रें सीधी
मेरा ‘आदि’ मेहरबान मुझ पर, बस में तेरे है ‘अनंत’
पास वक्ष से वक्ष सटा खोलो रहस्य सब अपने
प्यार से सना है आज यह समाँ, खुदाई स्नेह सिंची है
तेरी ज्वाला भड़कती रहे, प्यास रहे बढ़ती
साँस साँस तेरी गुलाब है
आँखें मदिरा मदिरा

अनुवादक : मोहन लाल ‘आश’

 

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