चौथा अंक-अन्धा युग-पहला अंक- धर्मवीर भारती-HindiPoetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dharamvir Bharati

post Contents ( Hindi.Shayri.Page)

चौथा अंक-अन्धा युग-पहला अंक- धर्मवीर भारती-HindiPoetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dharamvir Bharati

 

गांधारी का शाप

कथा-गायन

वे शंकर थे
वे रौद्र-वेशधारी विराट
प्रलयंकर थे
जो शिविर-द्वार पर दीखे
अश्वत्थामा को
अनगिनत विष भरे साँप
भुजाओं पर
बाँधे
वे रोम-रोम अगणित
महाप्रलय
साधे
जो शिविर द्वार पर दीखे
अश्वत्थामा को
बोले वे जैसे प्रलय-मेघ-गर्जन स्वर
“ मुझको पहले जीतो तब जाओ अंदर! “
युद्ध किया अश्वत्थामा ने पहले
शर, शक्ति, प्रास, नाराच, गदाएँ सारी
वे उनके एक रोम में
समा गयीं
सब
वह हार मान वन्दना
लगा करने
तब
( अश्वत्थामा का स्वर)
जटा कटाह सम्भ्रमन्निलिम्प निर्झरी समा
विलोल वीचि वल्लरी विराजमान मूर्धनि
धगद्धगद्धगज्जवललाट पट्ट पावके
किशोर चन्द्र शेखरे रति प्रतिक्षण मम।
वे आशुतोष हैं
हाथ उठाकर बोले !
( पर्दा उठने पर गान्धारी बैठी दीख पड़ती है और विदुर तथा संजय इस मुद्रा में खड़े हैं जैसे वार्तालाप पहले से चल रहा हो।)

गान्धारी

फिर क्या हुआ ?
संजय! फिर क्या हुआ ?

संजय

( पाठ करते हुए)
शंकर की दैवी असि लेकर अश्वत्थामा
जा पहुँचा योद्धा धृष्टध्युम्न के सिरहाने
बिजली-सा झपट, खींच कर शय्या के नीचे
घुटनों से दाब दिया उसको
पंजों से गला दबोच लिया
आँखों के कोटर से दोनों साबित गोले
कच्चे आमों की गुठली-जैसे उछल गये
खाली गढ्ढों से काला लहू उबल पड़ा।

गान्धारी

अन्धा कर दिया उसको पहले ही
कितना दयालु है अश्वत्थामा

संजय

बड़े कष्ट से जोड़-जोड़ कर शब्द
कहा उसने ‘वध करना है तो अस्त्रों से कर दो ‘
‘तुम योग्य नहीं हो उसके नरपशु धृष्टधुम्न !
तुमने निःशस्त्र द्रोण की कायर हत्या की,
यह बदला है !‘ फिर चूर-चूर कर दिये
ठोकरों से उसके मर्मस्थल

विदुर

बस करो।

गान्धारी

फिर क्या हुआ?

संजय

कोलाहल सुन जो अस्त-व्यस्त योद्धा जागे
आँखें मलते बाहर आये
उनको क्षण भर में गिरा दिया
तीखे जहरीले तीरों से
शतानीक को कुछ ना मिला तो पहिये से ही
वार किया।
अश्वत्त्थामा ने काट दिये उसके घुटने
सोया था दूर शिखंडी उसके पास पहुँच कर
माथे के बीच एक वाण मारा
जो मस्तक फाड़ चीरता चन्दन-शय्या को
धरती के अन्दर समा गया।

गान्धारी

फिर क्या हुआ संजय?

विदुर

हृदय तुम्हारा पत्थर का है गान्धारी!

गान्धारी

पत्थर की खानों से मणियाँ निकलती हैं
बाधा मत डालो विदुर
संजय फिर

विदुर

संजय नहीं, मुझसे सुनो
कितनी जघन्य वह
प्रतिहिंसा थी
कृपाचार्य, कृतवर्मा, बाहर थे
जितने बच्चे बूढ़े नौकर बाहर भागे
वाणों से छेद दिया उनको कृतवर्मा ने
डरे हुए हाथी चिग्घाण कर शिविरों को
चीरते हुए भागे
शय्या पर सोई हुई
स्त्रियाँ जहाँ थीं वहीं कुचल गयीं
उसी समय उन दोनों वीरों ने
पांडव शिविरों को लगा दी आग।

गान्धारी

कास कि मैं अपनी आँखों से
देख पाती यह?
कैसी ज्योति से घिरा होगा तब अश्वत्थामा!

संजय

धुँआ, लपट, लोथें, घायल घोड़े, टूटे रथ
रक्त, मेद, मज्जा, मुण्ड,
खंडित कबन्धों में
टूटी पसलियों में
विचरण करता था अश्वत्थामा
सिंहनाद करता हुआ
नर रक्त से वह तलवार उसके हाथों में
चिपक गयी थी ऐसे
जैसे वह उगी हो
उसी के भुजमूलों से।

गान्धारी

ठहरो
संजय ठहरो
दिव्यदृष्टि से मुझको दिखला दो एक बार
वीर अस्वत्थामा को

संजय

माता वह कुरूप है
भयंकर है

गान्धारी

किन्तु वीर है
उसने वह किया है
जो मेरे सौ पुत्र नहीं कर पाये
द्रोण नहीं कर पाये!
भीष्म नहीं कर पाये !

संजय

माता !
व्यास ने मुझको दिव्यदृष्टि दी थी
केवल युद्ध की के लिए
पता नहीं कब वह सामर्थ्य मुझसे छिन जाये !

गान्धारी

इसीलिए कहती हूँ।
अन्यायी कृष्ण इसके बाद अश्वत्थामा को
जीवित नहीं छोड़ेंगे
देखने दो मुझको उसे एक बार।

संजय

मैं प्रयास करता हूँ
मेरे सारे पुण्यों का बल समवेत होकर
दर्शन करायेगा
आपको अश्वत्थामा के
( ध्यान करता है)
दीवारों हट जाओ
राह में जो बाधाएँ दृष्टि रोकती हों
वे माया से सिमट जायँ
दूरी मिट जाये
क्षितिज रेखा के पार
दृष्टि से छिपे हैं जो दृश्य वे निकट आ जायँ।
( पीछे का पर्दा हटने लगता है, आगे के प्रकाश बुझने लगते हैं।)
अँधेरा है
यह वह स्थल है
जहाँ मरणासन्न दुर्योधन कल तक पड़ा था
अस्त्र-शस्त्र लिये हुए
कौन ये दोनों योद्धा आये
ये हैं कृपाचार्य, कृतवर्मा।
( पीछे दूर से वे अंधेरे में पुकारते हैं ‘ महाराज दुर्योधन‘ ‘ महाराज दुर्योधन!‘)

कृपाचार्य

कृतवर्मा
ज्योतिवाण फेंको
कुछ तिमिर घटे

कृतवर्मा

(नेपथ्य की ओर देखकर)
वे हैं महाराज
निश्चय ही अर्द्ध-मृत दुर्योधन को
खींच ले गये हैं हिसक पशु उस झाड़ी में

कृपाचार्य

जीवित हैं अभी
होंठ हिलते से लगते हैं।

कृतवर्मा

समझ नहीं पड़ता है
मुख से बह-बह कर रक्त
काले-काले थक्कों से जमा हुआ है चारो ओर
हलक भी जमी होगी।

कृपाचार्य

(रुक-रुक कर, जोर से)
महाराज !
सेनापति अश्वत्थामा ने
ध्वस्त कर दिया है पूरे पाण्डव-शिविर को आज
शेष नहीं बचा एक भी योद्धा।

कृतवर्मा

महीराज के मुख पर
आभा संतोष की झलक आयी।

कृपाचार्य

पलकें भी खोल लीं।

कृतवर्मा

ढूँढ रहे हैं किसे
शायद अश्वत्थामा को?

कृपाचार्य

महाराज!
अश्वत्थामा अपना बृह्मास्त्र
और मणि लेने गया है
उसे लेकर हम तीनों ओर वन में चले जायेंगे।

कृतवर्मा

महाराज की आँखों से बह रहे अश्रु !
( गान्धारी और संजय पर प्रकाश पड़ता है।)

संजय

यह क्या माता!
पट्टी उतारी ही नहीं तुमने
वह देखो आया अश्वत्थामा?

गान्धारी

नहीं ! नहीं ! नहीं !
देख नहीं पाऊँगी
किसी भी तरह मैं
मरणोन्मुख दुर्योधन को
रहने दो संजय
यह पट्टी बंधी है, बँधी रहने दो
मुझको बताते जाओ क्या हो रहा है वहाँ ?

विदुर

कुछ भी नहीं दीख पड़ रहा है मुझे।

संजय

अश्वत्थामा आ गया है
पर शीश झुकाये है
बिलकुल चुप है
( आगे का प्रकाश पुनः बुझ जाता है।)

 

कृपाचार्य

महाराज!
आपका अश्वत्थामा आ गया।
हाथ उठा सकते नहीं
एक बार दृष्टि उठा कर दे दें आशीष इसे।

अश्वत्थामा

नहीं स्वामी नहीं !
मैं अब भी अनधिकारी हूँ।
मैंने प्रतिशोध ले लिया धृष्टध्युम्न से
पिता की पाप-हत्या का
किन्तु अब भी आपका प्रतिशोध नहीं ले पाया।
शेष है अभी भी,
सुरक्षित है उत्तरा
जन्म देगी जो पांडव उत्तराधिकारी को
किंतु स्वामी
आपका कार्य पूरा करूँगा मैं
सूर्यलोक में जब द्रोण से मिलें आप
कहें

कृतवर्मा

किससे कहते हो
अश्वत्थामा, किससे कहते हो !
महाराज नहीं रहे।
( शोकसूचक संगीत। कृपाचार्य विह्वल होकर मुँह ढक लेते हैं। आगे गान्धारी चीख कर मूर्झित हो जाती है।)

अश्वत्थामा

किसका चीत्कार है यह !
माता गान्धारी
मैं कहता हूँ धैर्य धरो
जैसे तुम्हारी कोख कर दी है पुत्रहीन कृष्ण ने
वैसे ही मैं भी उत्तरा को कर दूंगा पुत्रहीन
जीवित नहीं छोड़ूंगा उसको मैं
कृष्ण चाहे सारी योगमाया से रक्षा करें।
( पीछे का परदा गिरने लगता है।)

गान्धारी

संजय,
संजय, मेरी पट्टी उतार दो
देखूंगी मैं अश्वत्थामा को
वज्र बना दूँगी उसके तन को
संजय
लो मैंने यह पट्टी उतार फेंकी
कहाँ है अश्वात्थामा।
( पीछे का पर्दा बिल्कुल बन्द हो जाता है।)

संजय

यह क्या हुआ माता ?
अब तक जो दिव्यदृष्टि से था मैं देख रहा
सहसा उस पर एक पर्दा-सा छा गया।

गान्धारी

जल्दी करो
आँसू न गिर आयें।

संजय

दीवारों हट जाओ
दीवारों हट जाओ!
माता ! माता !
मेरी दिव्यदृष्टि को क्या हो गया आज ?
दीवारों !
दीवारों!
आँखें नहीं खुलती हैं
अन्धों को सत्य दिखाने में क्या
मुझको भी अन्धा ही होना है।

विदुर

संजय
तुमको दीख नहीं पड़ता क्या
वन, दुर्योधन, या

संजय

नहीं विदुर
केवल दीवारें! दीवारें ! दीवारें !

विदुर

सब समाप्त होने की
जैसे यही एक बेला है।
( गान्धारी जड़ बैठी है।)

संजय

व्यास ! क्यों मुझको दिव्यदृष्टि दी थी
थोड़ी-सी अवधि के लिए
आज से कभी भी इस सीमित दृश्य जगत् से
मैं तृप्ति नहीं पाऊंगा
सीमाएँ तोड़ कर अनन्त में समाहित होने को
प्यासी मेरी आत्मा रहेगी सदा!

विदुर

माता उठो!
छोड़ो हस्तिनापुर को
चल कर समन्तपंचक
अंतिम संस्कार करें अपने कुटुम्बियों का
संजय !

संजय

सब बान्धवों से कह दो, परिजनों से कह दो,
आज ही करेंगे प्रस्थान युद्धभूमि को।
( जाते हुए)
अठ्ठारह दिनों का लोमहर्षक संग्राम यह
मुझको दृष्टि देकर और लेकर चला गया।
(युयुत्सु का प्रवेश)

युयुत्सु

चलो माता,

विदुर

महाराज को बुला लो।
युयुत्सु तुम भी चलो।

युयुत्सु

जिसने किया हो खुद वध
उसकी अंजलि का तर्पण
स्वीकार किसे होगा भला ?
वे मेरे बन्धु हैं
मेरे परिजन
किन्तु सुनो कृष्ण!
आज मैं किस मुँह से उनका तर्पण करूँगा ?
( सब जाते हैं। पीछे का पर्दा धीरे-धीरे उठता है।)

कथा-गायन

वे छोड़ चले कौरव नगरी को निर्जन
वे छोड़ चले वह रत्नजटित सिंहासन
जिसके पीछे युद्ध ङुआ था इतने दिन
सूनी राहें, चौराहे या घर, आँगन
जिस स्वर्ण-कक्ष में रहता था दुर्योधन
उसमें निर्भय वनपशु करते विचरण
वे छोड़ चले कौरव नगरी को निर्जन
करने अपने सौ पुत्रों का तर्पण
आगे रथ पर कौरव विधवाओं को ले
है चली जा चुकी कौरव-सेना सारी
पीछे पैदल आते हैं शीश झुकाये
धृतराष्ट्र, युयुत्सु, विदुर, संजय, गान्धारी
( क्रम से धृतराष्ट्र, युयुत्सु, विदुर, संजय और गान्धारी धीरे-धीरे चलते हुए ऊपर आते हैं। धृतराष्ट्र एक बार लड़खड़ाते हैं।)

धृतराष्ट्र

वृद्ध है शरीर
और जर्जर है
चला नहीं जाता है।

विदुर

संजय तनिक रुको !
( महाराज बैठ जाते हैं। सब रुक जाते हैं।)

युयुत्सु

किसके हैं रथ वे
उधर झाड़ी में छिपे-छिपे

संजय

वे तो हैं कृपाचार्य!

विदुर

इधर कृतवर्मा हैं !

गान्धारी

संजय ! क्या अश्वत्थामा !

विदुर

हाँ माता
वह है अश्वत्थामा।

धृतराष्ट्र

जाने दो।

गान्धारी

रोको उसे।

संजय

रुको
ओ रुको अश्वत्थामा
हम हैं संजय
माता गान्धारी, महाराज,
संग हैं हमारे
विदुर और युयुत्सु

धृतराष्ट्र

संजय!
मत नाम लो युयुत्सु का
क्रोधित अश्वत्थामा जीवित नहीं छोड़ेगा
मेरा है केवल एक पुत्र शेष
खोकर उसे कैसे जीवित रहूँगा?

गान्धारी

और जब पुत्र वह पराक्रमी यशस्वी है।
संजय चलो
यहीं रहने दो युयुत्सु को
पुत्र कहीं छिप जाओ
प्राण बचाओ
अब तुम्ही हो आश्रय
अपने अन्धे पिता वृद्ध माता के
( संजय के साथ जाती है)

युयुत्सु

यह सब मैं सुनूँगा
और जीवित रहूँगा
किन्तु किसके लिए
किन्तु किसके लिए।

धृतराष्ट्र

मेरे अन्धेपन से तुम थे उत्पन्न पुत्र !
वही थी तुम्हारी परिधि !
उसका उल्लंघन कर तुमने
जो ज्योतिवृत्त में रहना चाहा

विदुर

क्या वह अपराध था ?
( गान्धारी और संजय लौट आते हैं)

धृतराष्ट्र

आ गये संजय तुम !

संजय

अश्वत्थामा तो
बिल्कुल बदला हुआ-सा है।
वीर नहीं वह तो जैसे भय की प्रतिमूर्ति है।
रह-रह काँप उठता है
रथ की वल्गाएँ हाथों से छूट जाती हैं।
( दूर कहीं शंख-ध्वनि)

गान्धारी

पागल है
कहता है मैं वल्कल धारण कर
रहूँगा तपोवन में
डरता है कृष्ण से।
( पुनः कई विष्फोट और एक अलौकिक प्रकाश)

संजय

पांडवों को लेकर साथ
कृष्ण आ रहे हैं
उसकी खोज में

गान्धारी

मार नहीं पायेंगे कृष्ण उसे
मैंने उसे देखकर
वज्र कर दिया है उसके तन को!
( दूर कहीं विष्फोट)

विदुर

लगता है
ढूँढ लिया है प्रभु ने उसे।

धृतराष्ट्र

संजय देखो तो जरा।

संजय

मेरी दिव्यदृष्टि वापस ले ली है व्यास ने।

युयुत्सु

यह तो प्रकाश है
अर्जुन के अग्निबाण का!

विदुर

झुलस-झुलस कर
गिर रही हैं वनस्पतियाँ।
( बुझे हुए दो अग्नि-वाण मंच पर गिरते हैं।)

विदुर

माता चलो
सुरक्षित नहीं है यहाँ
गिरते जाते हैं जलते वाण यहाँ।
( जाते हैं। कुछ क्षण स्टेज खाली रहता है। नेपथ्य में शंखनाद। लगातार विष्फोट। तीव्र प्रकाश)
( अकस्मात दौड़ता हुआ अश्वत्थामा आता है। उसके गले में वाण चुभा हुआ है। खींच कर वाण निकालता है और रक्त बह निकलता है। इतने में दूसरा वाण आता है जिसे वह बचा जाता है और फिर तन कर खड़ा हो जाता है। क्रोध से आरक्त मुख।)

अश्वत्थामा

रक्षा करो।
अपनी अब तुम अर्जुन !
मैंने तो सोचा था-
वल्कल धारण कर रहूँगा तपोवन में
पूरे पांडव को
निर्मूल किये बिना शायद
युद्धलिप्सा
नहीं शान्त होगी कृष्ण की।
अच्छा तो यह लो!
अर्जुन स्मरण करो अपने
विगत कर्म
इसके प्रभाव को
एक क्या करोड़ कृष्ण मिटा नहीं पायेंगे।
सुनो तुम सब नभ के देवगण
अपने-अपने
विमानों पर आरूढ़
देख रहे हो जो इस युद्ध को
साक्षी रहोगे तुम
विवश किया है मुझे अर्जुन ने
यह लो
यह है बृह्मास्त्र!
( कोई काल्पनिक वस्तु फेंकता है। ज्वालामुखी की-सी गड़गड़ाहट। तेज महताबी-सा प्रकाश, फिर अँधेरा।)

व्यास

( आकाशवाणी)
यह क्या किया?
अश्वत्थामा! नराधम !
यह क्या किया !

अश्वत्थामा

कौन दे रहा है अपनी
मृत्यु को निमंत्रण
मेरे प्रतिशोध में बाधक बन कर

व्यास

मैं हूँ व्यास।
ज्ञात क्या तुम्हें है परिणाम इस बृह्मास्त्र का ?
यदि यह लक्ष्य सिद्ध हुआ ओ नरपशु !
तो आगे आने वाली सदियों तक
पृत्वी पर रसमय वनस्पति नहीं होगी
शिशु होंगे पैदा विकलांग और कुष्ठग्रस्त
सारी मनुष्य जाति बौनी हो जायेगी
जो कुछ भी ज्ञान संचित किया है मनुष्य ने
सतयुग में, त्रेता में, द्वापर में
सदा सदा के लिए होगा विलीन वह
गेहूँ की बालों में सर्प फुफकारेंगे
नदियों में बह-बहा कर आयेगी पिघली आग।

अश्वत्थामा

भस्म हो जाने दो
आने दो प्रलय व्यास!
देखूँ मैं रक्षण-शक्ति कृष्ण की ?
व्यास- तो देख उधर
कृष्ण के कहने से पहले ही
अर्जुन ने छोड़ दिया था नभ में अपना बृह्मास्त्र
लेकिन नराधम
ये दोनों बृह्मास्त्र अभी नभ में टकरायेगें
सूरज बुझ जायेगा।
धरा बंजर हो जायेगी।
( फिर गड़गड़ागहट। तेज प्रकाश और फिर अँधेरा।)

अश्वत्थामा

मैं क्या करूँ
मुझको विवश किया अर्जुन ने
मैं था अकेला और अन्यायी कृष्ण पांडवों के सहित
मेरा वध करने को आतुर थे।
( भयानक आर्तनाद)

व्यास

अर्जुन सुनो
मैं हूँ व्यास
तुम वापस ले लो बृह्मास्त्र को
अश्वत्थामा! अपनी कायरता से तू
मत ध्वस्त कर मनुजता को
वापस ले अपना बृह्मास्त्र और मणि देकर
वन में चला जा

अश्वत्थामा

व्यास! मैं अशक्त हूँ,
मुझको है ज्ञात रीति केवल आक्रमण की
पीछे हटना मुझको या मेरे अस्त्रों को
मेरे पिता ने सिखाया नहीं।
व्यास- सूरज बुझ जायेगा।
धरा बंजर हो जायेगी।

अश्वत्थामा

अच्छा तो सुन लो व्यास
सुन लो कृष्ण

यह अचूक अस्त्र अश्वत्थामा का
निश्चित गिरे जाकर
उत्तरा के गर्भ पर
वापस नहीं होगा
भयानक विस्फोट।

व्यास

तुम पशु हो !
तुम पशु हो !
तुम पशु हो !
( अश्वत्थामा विकट अट्टाहास करता है।)

अश्वत्थामा

था मैं नहीं
मुझको युधिष्ठिर ने बना दिया।
( पर्दा गिरकर आगे का दृश्य। नेपथ्य में पाण्डव-वधुओं का क्रन्दन सुन पड़ता है। गान्धारी और संजय आते हैं।)

गान्धारी

चलते चलो संजय !
क्रंदन यह कैसा है ?
सुनते हो?

संजय

अश्वत्थामा का बृह्मास्त्र जा गिरा है
उत्तरा के गर्भ पर।

गान्धारी

करेगा
वह अपना प्रण पूरा करेगा।

संजय

( रुककर)
माता, किन्तु कृष्ण उसे क्षमा नहीं करेंगे।

गान्धारी

(चलते-चलते)
संजय उसका वध नहीं कर सकेंगे कृष्ण
चक्र यदि कृष्ण का खण्ड-खण्ड मुझको
कर भी दे
तो,
मैं तो अभी जाऊँगी वहाँ
जहाँ गहन मृत्युनिद्रा में सोया है दुर्योधन
चलते चलो संजय!
( जाते हैं। धृतराष्ट्र और युयुत्सु का प्रवेश।)

धृतराष्ट्र

वत्स, तुम मेरी आयु लेकर भी
जीवित रहो
अश्वत्थामा का बृह्मास्त्र
यदि गिरा है उत्तरा पर
तो कौन जाने एक दिन युधिष्ठिर
सब राजपाट तुमको ही सौंप दे!

युयुत्सु

( कटु हँसी हँसकर)
और इस तरह
अश्वत्थामा की पशुता
मेरा खोया हुआ भाग्य फिर लौटा लाये!
नहीं पिता नहीं,
इतना ही दंशन क्या काफी नहीं है इस अभागे को।)
( पाण्डवों की जयध्वनि सुन पड़ती है ; विदुर आते हैं)

धृतराष्ट्र

यह कैसी जयध्वनि?

विदुर

महाराज!
रक्षा कर ली उत्तरा की मेरे प्रभु ने !

धृतराष्ट्र

( एक क्षण को स्तब्ध होकर)
कैसे विदुर !

विदुर

बोले वे
यदि यह बृह्मास्त्र गिरता है तो गिरे
लेकिन जो मुर्दा शिशु होगा उत्पन्न
उसे जीवित करूँगा मैं देकर अपना जीवन।

धृतराष्ट्र

अश्वत्थामा को
क्या छोड़ दिया कृष्ण ने?

विदुर

छोड़ दिया!
केवल भ्रूण हत्या का शाप
उसे दिया और
उससे मणि ले ली
मणि देकर लेकर शाप
खिन्न मन अश्वत्थामा
नतमस्तक चला गया।

युयुत्सु

(जिस पर कोई भावनात्मक प्रतिक्रिया लक्षित नहीं होती)
मुझको आशंका है
माता गान्धारी
सुन कर पराजय अपने अश्वत्थामा की
जाने क्या कर डालें !

धृतराष्ट्र

चलो विदुर
आगे गयी हैं वे !
मैं भी धीरे-धीरे आता हूँ !
( पहले तेजी से विदुर, फिर धृतराष्ट्र और युयुत्सु उधर जाते हैं जिधर गान्धारी गयी हैं। पर्दा खुलकर अंदर का दृष्य। संजय, गान्धारी और विदुर।)

संजय

यह वह स्थल है
यहीं कहीं हुए थे धाराशायी महाराज दुर्योधन!
यह है स्वर्ण शिरस्त्राण
यह है गदा उनकी
यह है कवच उनका।
( गान्धारी पट्टी उतार देती है। एक-एक वस्तु को टटोल-टटोलकर देखती है। कवच पर हाथ फेरते हुए रो पड़ती है।)

विदुर

माता धैर्य धारण करें!
कवच यह मिथ्या ता
केवल स्वयम् किया हुआ
मर्यादित आचरण कवच है
जो व्यक्ति को बचाता है
माता
( सहसा गान्धारी नेपथ्य की ओर देखती है।)

गान्धारी

कौन है वह
झाड़ी के पास मौन बैठा हुआ
कोई जीवित व्यक्ति ?

विदुर

माता !
उधर मत देखें !

गान्धारी

लगता है जैसे अश्वत्थामा

संजय

नहीं नहीं
इतना कुरूप
अंग-अंग गला कोढ़ से
रोगी कुत्तों सा दुर्गन्धयुक्त।

गान्धारी

लौटा जा रहा है !
वह कौन है विदुर !
रोको !

विदुर

माता उसे जाने दें
वह अश्वत्थामा है
दण्ड उसे दिया भ्रूण हत्या का कृष्ण ने
शाप दिया उसको
कि जीवित रहेगा वह
लेकिन हमेशा जख्म ताजा रहेगा
प्रभु चक्र उसके तन पर
रक्त सना घूमेगा
गहन वनों में युग-युगान्तर तक
अंगों पर फोड़े लिये
गले हुए जख्मों से चिपटी हुई पट्टियाँ
पीप, थूक, कफ से सना जीवित रहेगा वह
मरने नहीं देंगे प्रभु! ! लेकिन अगणित रौरव की
पीड़ा जगती रहेगी रोम-रोम में

गान्धारी

संजय उसे रोको!
लोहा मैं लूँगी आज कृष्ण से उसके लिए।

संजय

माता, वह चला गया
आया था शायद विदा लेने
दुर्योधन के अन्तिम अस्थि-शेषों से

गान्धारी

अस्थि-शेष?
तो क्या वह पड़ा है
कंकाल मेरे पुत्र का ?

विदुर

धैर्य धरो माता !

गान्धारी

( हृदय-विदारक स्वर में)
तो, वह पड़ा है कंकाल मेरे पुत्र का
किया है यह सब कुछ कृष्ण
तुमने किया है यह
सुनो !
आज तुम भी सुनो
मैं तपस्विनी गान्धारी
अपने सारे जीवन के पुण्यों का
अपने सारे पिछले जन्मों के पुण्यों का
बल लेकर कहती हूँ
कृष्ण सुनो !
तुम यदि चाहते तो रुक सकता था युद्ध यह
मैंने प्रसव नहीं किया था कंकाल का
इंगित पर तुम्हारे ही भीम ने अधर्म किया
क्यों नहीं तुमने वह शाप दिया भीम को
जो तुमने दिया निरपराध अश्वत्थामा को
तुमने किया है प्रभुता का दुरुपयोग
यदि मेरी सेवा में बल है
संचित तप में धर्म है
तो सुनो कृष्ण !
प्रभु हो या परात्पर हो
कुछ भी हो
सारा तुम्हारा वंश
इसी तरह पागल कुत्तों की तरह
एक-दूसरे को परस्पर फाड़ खायेगा
तुम खुद उनका विनाश करके कई वर्षों बाद
किसी घने जंगल में
साधारण व्याध के हाथों मारे जाओगे
प्रभु हो
पर मारे जाओगे पशुओं की तरह।
( वंशी ध्वनि। कृष्ण की छाया)

कृष्ण ध्वनि

माता !
प्रभु हूँ या परात्पर
पर पुत्र हूँ तुम्हारा, तुम माता हो !
मैंने अर्जुन से कहा-
सारे तुम्हारों कर्मों का पाप-पुण्य, योगक्षेम
मैं वहन करूँगा अपने कंधों पर
अट्ठारह दिनों के इस भीषण संग्राम में
कोई नहीं केवल मैं ही मरा हूँ करोड़ों बार
जितनी बार जो भी सैनिक भूमिशायी हुआ
कोई नहीं था
वह मैं ही था
गिरता था जो घायल होकर रणभूमि में।
अश्वत्थामा के अंगों से
रक्त, पीप, स्वेद बन कर बहूँगा
मैं ही युग-युगान्तर तक
जीवन हूँ मैं
तो मृत्यु भी तो मैं ही हूँ माँ।
शाप यह तुम्हारा स्वीकार है।

गान्धारी

यह क्या किया तुमने ?
( फूट-फूटकर रोने लगती है)
रोई नहीं मैं अपने
सौ पुत्रों के लिए
लेकिन कृष्ण तुम पर
मेरी ममता अगाध है।
कर देते शाप यह मेरा तुम अस्वीकार
तो क्या मुझे दुःख होता?
मैं थी निराश, मैं कटु थी,
पुत्रहीना थी।

कृष्ण ध्वनि

ऐसा मत कहो
माता!
जब तक मैं जीवित हूँ
पुत्रहीना नहीं हो तुम।
प्रभु हूँ या परात्पर
पर पुत्र हूँ तुम्हारा
तुम माता हो

गान्धारी

(रोते हुए)
मैंने क्या किया विदुर ?
मैंने क्या किया ?

कथा-गायन

स्वीकार किया यह शाप कृष्ण ने जिस क्षण से
उस क्षण से ज्योति सितारों की पड़ गयी मन्द
युग-युग की संचित मर्यादा निष्प्राण हुई
श्रीहीन हो गये कवियों के वर्ण-छन्द
यह शाप सुना सबने पर भय के मारे
माता गान्धारी से कुछ नहीं कहा
पर युग सन्ध्या की कलुषित छाया-जैसा
यह शाप सभी के मन पर टँगा रहा।
( पटाक्षेप)

 

Leave a Reply