चेतावनी चौपदे -पवित्र पर्व -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

चेतावनी चौपदे -पवित्र पर्व -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

चौगुना हो प्रफुल्ल होली में।
पर बने मन कभी न मतवाला।
लालिमा रख सकें न जो उसकी।
तो बना दें न जाति मुँह काला।1।

खोल दिल जो गले न मिल पावें।
तो मिला दें न मान मिट्टी में।
खुल सके गाँठ जो नहीं जी की।
तो पड़े गाँठ क्यों किसी जी में।2।

हो भले किसलिए करें भूलें।
हो न सिर पर सवार नादानी।
लोग पानी गँवा गँवा अपना।
क्यों किसी का उतार लें पानी।3।

हैं बड़े बाप के अगर बेटे।
सभ्यता का गला न तो कतरें।
है बड़ा ही कमीनपन लिखना।
गालियों से भरी हुई सतरें।4।

हो कपूती सवार क्यों सिर पर।
काम करते रहें सपूतों का।
भूल त्योहार के गले में हम।
डाल देवें न हार जूतों का।5।

कौन होगा अधिक अधाम उससे।
ऐंठ वह है विदग्ध रस्सी की।
सर उठाकर पुनीत अवसर पर।
जो कसर है निकालता जी की।6।

रंग बिगड़े न रंग के खेले।
पी न लेवें प्रमाद का प्याला।
गौरवित को लताड़ गाली लिख।
लेखनी का करें न मुँह काला।7।

हैं अधम से अधम पतिततम हैं।
हैं कुटिल मति कपट विटप थाले।
आड़ में बैठ पूत पर्बों की।
पेट का मल निकालने वाले।8।

लाल हैं क्यों न खेल लें होली।
लोक मुँह की बचा बचा लाली।
चुटकियाँ चाल ढाल की ले ले।
दे बड़ों को गढ़ी हुई गाली।9।

खोल कर दिल गले मिलें कैसे।
पगड़ियाँ क्यों नहीं उछालेंगे।
है कसर जब कसर निकलने में।
क्यों नहीं तब कसर निकालेंगे।10।

हो सकेगी न धूम की होली।
भंग गाढ़ी न जाय जो छानी।
बीज बो दें उपाधि का न अगर।
दे बड़ों को उपाधि मनमानी।11।

है बड़ा पूत पर्व होली का।
क्यों उसे हम बुरा बनाते हैं।
जाति पर धूल फेंकते हैं, क्यों-
धर्म को धूल में मिलाते हैं।12।

दिल मिलाए मिला न दिल से तो।
कर सका मेल कौन किससे कब।
जब न अनुराग रंग चढ़ पाया।
क्या हुआ रंग खेलने से तब।13।

हो सकेगा न कुछ गुलाल मले।
सुख घड़ी क्यों बने घड़ी दुख की।
कालिमा है भरी हुई उर में।
तो रहेगी न लालिमा मुख की।14।

रंग लायें गुलाल की मूँठें।
मोह लेवे मिठास बोली की।
पटु रहे रीझने रिझाने में।
कटु ठठोली बने न होली की।15।

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