चेतना-कविता-मोहनजीत कुकरेजा -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mohanjeet Kukreja

चेतना-कविता-मोहनजीत कुकरेजा -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mohanjeet Kukreja

 

याद है वो दिन… जब ख़्यालों की दुनिया में
मैं कुछ ज़रूरत से ज़्यादा ही खो गया था…
कुछ सोचते-सोचते, लगभग बेसुध हो गया था !
फिर जब चेतना लौटी… तो मैंने पाया –
कुछ लोग लिए जा रहे थे
काँधों से लगाए – मेरी ही अर्थी को !
जनाज़े के पीछे की भीड़ को मैंने ग़ौर से देखा,
काफ़ी लोग थे – जाने-पहचाने और कुछ अनजाने !
कुछ ऐसे चेहरे, जिन्हें मैं पहचानता था;
और कुछ ऐसे, जो शायद मुझे जानते रहे हों !
सब की आँखें नम थीं और ज़ुबाँ पर मेरे अफ़्साने थे –
‘ख़ुदा जन्नत बख़्शे… बहुत ख़ूबियां थीं मरने वाले में !’
मुझे लगा मैंने शायद कुछ जल्दबाज़ी की,
इन सबको तो वाक़ई मुझ से प्यार था…
पर दिल ने दलील पेश की – ‘तूने कोई ग़ल्ती नहीं की,
ये मुर्दा-परस्त लोग बस यूँ ही किया करते हैं !’
और मैं… एक बार फिर ‘अचेत’ हो गया था !
मुझे आज भी याद है वो दिन !!

 

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