चुपके-चुपके मन में रोऊँ, बस मेरा अधिकार यही है-नदी किनारे-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

चुपके-चुपके मन में रोऊँ, बस मेरा अधिकार यही है-नदी किनारे-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

चुपके-चुपके मन में रोऊँ, बस मेरा अधिकार यही है।

जीवन के मरुवत्-प्रदेश पर,
अरमानों के धूम्र-शेष पर,
अश्रु अजस्र बहाता जाऊँ, बस मेरा व्यापार यही है।
चुपके-चुपके मन में रोऊँ, बस मेरा अधिकार यही है।

कर की संचित आशाओं को,
औ’ अपूर्ण अभिलाषाओं को,
निर्ममता के कुचलूँ निशिदिन, बस मेरा अभिसार यही है।
चुपके-चुपके मन में रोऊँ, बस मेरा अधिकार यही है।

नेत्र मून्द लूँ रात बना लूँ,
और खोलकर प्रात बना लूँ,
कवि की चेतनता का इस जग में केवल संसार यही है।
चुपके-चुपके मन में रोऊँ, बस मेरा अधिकार यही है।

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