चीटी कै उदर बिखै हसती समाय कैसे-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

चीटी कै उदर बिखै हसती समाय कैसे-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

चीटी कै उदर बिखै हसती समाय कैसे
अतुल पहार भार भ्रिंगीन उठावयी ।
माछर कै डंग न मरत है बसित नागु
मकरी न चीतै जीतै सरि न पूजावयी ।
तमचर उडत न पहूचै आकास बास
मूसा तउ न पैरत समुन्द्र पार पावयी ।
तैसे प्रिय प्रेम नेम अगम अगाधि बोधि
गुरमुखि सागर ज्यु बून्द हुइ समावयी ॥७५॥

Leave a Reply