चीकने कलस पर जैसे ना टिकत बून्द-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

चीकने कलस पर जैसे ना टिकत बून्द-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

चीकने कलस पर जैसे ना टिकत बून्द
कालर मैं परे नाज निपजै न खेत जी ।
जैसे धरि पर तरु सेबल अफल अरु
बिख्या बिरख फले जगु दुख देत जी ।
चन्दन सुबास बांस बास बास बासीऐ ना
पवन गवन मल मूतता समेत जी ।
गुर उपदेस परवेस न मो रिदै भिदे
जैसे मानो स्वांतिबून्द अह मुख लेत जी ॥६३८॥

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