चाहत-प्रहरी : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

चाहत-प्रहरी : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

काश ! मैं टूटे दिलों को जोड़ पाता
आँधियों की राह को मैं मोड़ पाता।

पोछ पाता अश्क जो दृग से बहे
वक्त की जो मार बेबस हो सहे।

चाहता ले लूँ जलन जो हैं जले
जो कुचलकर जी रहे पग के तले।

क्यों कोई पीये गरल होके विवश
है भरी क्यों जिन्दगी में कशमकश?

दूँ नयन को नींद, दिल को आस भी
हार में दूँ जीत का एहसास भी।

स्वजनों से जो छुटे उनको मिला दूँ
रुग्ण जन को मैं दवा कर से पिला दूँ।

डूबते जो हैं बनूँ उनका सहारा
दे सकूँ सुख, ले किसी का दर्द सारा।

माँग का सिन्दूर बहनों का बचा लूँ
दे सकूँ गर जिन्दगी विष भी पचा लूँ।

चाहता मैं वाटिका मुकुलित, हरी हो
डालियाँ हर पुष्प, किसलय से भरी हो।

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