चाहता मन-बोलने दो चीड़ को -नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

चाहता मन-बोलने दो चीड़ को -नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

 

गोमती तट
दूर पेन्सिल-रेख-सा
वह बाँस झुरमुट
शरद दुपहर के कपोलों पर उड़ी वह
धूप की लट।
जल के नग्न ठण्ढे बदन पर का
झुका कुहरा
लहर पीना चाहता है।
सामने के शीत नभ में
आइरन-व्रिज की कमानी
बाँह मस्जिद की
बिछी हैं।
धोबियों की हाँक
वट की डालियाँ दुहरा रहीं हैं।
अभी उड़कर गया है वह
छतरमंजिल का कबूतर झुण्ड।
तुम यहाँ
बैठी हुई थीं अभी उस दिन
सेब-सी बन लाल,
चिकने चीड़-सी वह
बाँह अपनी टेक पृथ्वी पर
यहाँ इस पेड़-जड़ पर बैठ
मेरी राह में
उस धूप में।
बह गया वह नीर
जिसकी पदों से तुमने छुआ था।
कौन जाने
धूप उस दिन की कहाँ है
जो तुम्हारे कुन्तलों में
गरम, फूली
धुली, धौली लग रही थी।

चाहता मन
तुम यहाँ बैठी रहो,
उड़ता रहे चिड़ियों सरीखा
वह तुम्हारा धवल आँचल।
किन्तु
अब तो ग्रीष्म
तुम भी दूर
और यह लू।

१५ नवंबर १९४९ : लखनऊ

 

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